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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 344 of 590

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Page 344

३१४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद

भासरूपव्यावहारिकसत्यत्वविषयत्वोपपत्तेः । न चैवं सति पारमार्थिक-
सत्यत्वस्य ब्रह्मगतस्य प्रपञ्चे प्रसक्त्यभावात् तेन रूपेण प्रपञ्चनिषेधानु-
पपत्तिः । यथा शुक्तौ रजताभासप्रतीतिरेव सत्यरजतप्रसक्तिरिति तन्नि-
षेधः, अत एव ‘नेदं रजतम्, किन्तु तत्’, ‘नेयं मदीया गौः, किन्तु
सैव,’ ‘नात्र वर्तमानश्चैत्रः, किन्त्वपवरके’ इति निषिध्यमानस्याऽन्यत्र
सत्त्वमवगम्यते, एवं सत्यत्वाभासप्रतीतिरेव सत्यत्वप्रसक्तिरिति तन्नि-
षेधोपपत्तेः । अतो वर्णपदयोग्यतादिस्वरूपोपमर्दशङ्काभावान्नोपजीव्य-
विरोध इत्याहुः ।

अन्येऽविवेकादेकैव ब्रह्मसत्ता घटादिषु ।
असन्निकृष्टे ह्यध्यासोऽन्यत्र संसर्गकल्पनम् ॥ १७ ॥

एक ही ब्रह्मसत्ता घट आदिमें अविवेकसे गृहीत होती है । असन्निकृष्ट स्थलमें
अध्यास होता है और अन्यत्र—सन्निकृष्ट स्थलमें संसर्गकी कल्पना की जाती है ॥ १७ ॥

अन्ये तु ब्रह्मणि पारमार्थिकसत्यत्वम्, प्रपञ्चे व्यावहारिकसत्यत्वं
सत्यत्वाभासरूपम्, शुक्तिरजतादौ प्रातिभासिकसत्यत्वं ततोऽपि निकृष्ट-


यदि शङ्का हो कि प्रपञ्चमें व्यावहारिक सत्यत्व माननेपर ब्रह्ममें रहनेवाले
पारमार्थिक सत्यत्वकी प्रपञ्चमें प्रसक्ति न होनेके कारण पारमार्थिक सत्यत्वरूपसे
प्रपञ्चका निषेध नहीं हो सकता है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जैसे
शुक्तिमें रजताभासकी प्रतीति ही सत्य रजतकी प्रसक्ति है, इससे उसका निषेध
होता है, इसीलिए यह रजत नहीं है, किन्तु वह रजत है, यह मेरी गाय नहीं
है, किन्तु वह मेरी गाय है, यहाँ चैत्र वर्तमान नहीं है, किन्तु भीतर है, इस
प्रकारका निषेध होता है, उनकी अन्यत्र सत्ता ज्ञात होती है, वैसे ही सत्यत्वा-
भासप्रतीति ही सत्यत्वप्रसक्ति है, इसलिए उस सत्यत्वका प्रपञ्चमें निषेध हो
सकता है । इससे वर्ण, पद, योग्यता आदि स्वरूपोपमर्दकी शङ्का न होनेसे
उपजीव्यके साथ कोई विरोध नहीं है ।

कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्ममें पारमार्थिक सत्यत्व प्रपञ्चमें सत्यत्वाभासरूप
व्यावहारिक सत्यत्व और शुक्तिरजत आदिमें व्यावहारिक सत्यतासे निकृष्ट
प्रातिभासिक सत्यत्व, इस प्रकार सत्ताका त्रैविध्य नहीं हैं ? किन्तु ब्रह्मरूप

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