सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ३१२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ द्वितीय परिच्छेद |
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इत्येवाऽसत्त्वनिर्वचनाद्, विधान्तरेण तन्निर्वचनायोगादिति वाच्यम्; असतः सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वमुपगच्छता, तथात्वे-प्रत्यक्षस्य सर्वदेशकालयोः प्रत्यक्षीकरणायोगेन, आगमस्य तादृशागमानुपलम्भेन च प्रमाणयितुमशक्यतयाऽनुमानमेव प्रमाणयितव्यमिति तदनुमाने यत् सद्द्यावृत्तं लिङ्गं वाच्यम्, तस्यैव प्रथमप्रतीतस्यासत्त्वनिर्वचनत्वोपपत्तेरित्याहुः ।
पारमार्थिकसत्यत्वं नेह नानेति नुद्यते ।
व्यावहारिकसत्यत्वं न निषिद्धमितीतरे ॥ १६ ॥
'नेह नानास्ति' इत्यादि श्रुतिसे प्रपञ्चके पारमार्थिक रूपका ही बाध होता है, व्यावहारिक स्वरूपका बाध नहीं होता, इससे आगमका उपजीव्य प्रत्यक्षसे विरोध नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ १६ ॥
कि सब देश और काल आदिके साथ सम्बन्ध रखनेवाले निषेधका जो प्रतियोगी हो, इसके सिवा अन्य कोई प्रकार नहीं है, जिससे कि असत्का निर्वचन हो सके; तो यह भी शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि जो महाशय असत्को सर्वदेशकालसम्बन्धी निषेधका प्रतियोगी मानते हैं, वे उस प्रकारके असत्त्वमें प्रत्यक्षको प्रमाण नहीं दे सकते हैं, क्योंकि सब देश और कालका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है, उसी प्रकार शशशृङ्ग आदि सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधके प्रतियोगी हैं इसमें आगम भी प्रमाण नहीं हो सकता है, क्योंकि उस प्रकारका असत्त्वबोधक कोई आगम मिलता ही नहीं, अतः अनुमान ही प्रमाणको कहना होगा। उस अनुमानमें जो ॐ सद्द्यावृत्त हेतु करोगे उसीको, प्रथमोपस्थित होनेके कारण, असत्का लक्षण मानेंगे ।
* सत् पदार्थमें नहीं जानेवाला जो हेतु करोगे वही असत्का लक्षण होगा अर्थात् शशशृङ्ग असत् है, निःस्वरूप होनेसे, जो निःस्वरूप नहीं है वह असत् भी नहीं है, जैसे ब्रह्म इस प्रकारके अनुमानसे ही शशशृङ्ग आदिमें तुम्हें असत्त्वकी सिद्धि करनी होगी, इसलिए प्रथमोपस्थित होनेसे निःस्वरूपत्व ही असत्का निर्दुष्ट लक्षण हो सकता है, तो किसलिए सर्वदेशकालसम्बन्धिनिषेधप्रतियोगित्वरूप असत्त्व मानना चाहिए ? नहीं मानना चाहिए, प्रकृतमें ज्ञाननिवर्त्यत्वरूप स्वरूप प्रपञ्चमें है, इसलिए प्रपञ्चमें निःस्वरूपत्वरूप असत्त्व नहीं है, अतः शशशृङ्गादिसे प्रपञ्च विलक्षण हो सकता है, यह भाव है।