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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 316 of 590

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Page 316
२८६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

अर्थवादानामपि प्रयाजाद्यङ्गविधिवाक्यानामिव स्वार्थप्रमितावन्न्यार्थ-
तया प्रमितानामेवार्थानां प्रयोजनवशादन्यार्थतेति प्रयाजादिवाक्यवत्तेषा-
मप्यवान्तरसंसर्गे तात्पर्यमस्त्येव, वाक्यैकवाक्यत्वात् । पदैकवाक्यतायामेव


अर्थवादवाक्योंके भी—प्रयाज आदि अङ्गोंके विधायक वाक्योंके समान—
स्वार्थका अवबोध होनेपर अन्य प्रयोजन न होनेसे प्रमित अर्थोंका ही किसी
प्रयोजनवशसे उन अर्थवादोंमें अन्यार्थपरता है, अतः प्रयाज आदि वाक्योंके समान
अर्थवादोंका भी अवान्तरपदार्थसंसर्गके बोधमें तात्पर्य है ही, अर्थात् अर्थवाद
वाक्योंका भी विधिके अन्वयके पूर्वकालमें स्वरसतः प्रतीयमान देवताके
विग्रह ( शरीर ) आदिके संसर्गमें भी अवान्तर ‡ तात्पर्य माननेमें कोई विरोध
नहीं है, क्योंकि वाक्यैकवाक्यता है अर्थात् विधिवाक्योंके साथ अर्थवादवाक्योंकी


एकरस चैतन्यरूप वस्तुके प्रतिपादनमें ही है, क्योंकि 'तमेवैकं जानथ आत्मानम्' ( हे
मुमुक्षु लोगो उसी आत्माको जानो, जिसमें यह समस्त जगत् अध्यस्त है ) 'तमेव विदित्वाऽति-
मृत्युमेति' (उसी प्रकृत पर आत्माको जानकर संसाररूप मृत्युको तैर जाता है) 'एकधैवानुद्रष्टव्यम्'
( शास्त्र और आचार्यके उपदेशके बाद एकरूपसे आत्माको जानना चाहिए ) इत्यादि अनेक
श्रुतियोंसे मुक्तिके प्रति साधनभूत महावाक्यार्थके ज्ञानके प्रति केवल उक्त चैतन्यात्मक वस्तुका ही
नियमन होता है, इस प्रकारकी वस्तुके बोधनमें तात्पर्य रखनेवाले महावाक्योंकी जब तक
लक्षणा न मानी जाय, तब तक उक्त तात्पर्यका निर्वाह नहीं हो सकता है, अतः उन महा-
वाक्योंमें तात्पर्यके अनुसार लक्षणाका अभ्युपगम किया गया है, प्रत्यक्षके साथ विरोधके परिहार-
के लिए लक्षणाका अभ्युपगम नहीं किया गया है । और जो 'प्रत्यक्षविरोधके परिहारके लिए
महावाक्योंमें लक्षणाका स्वीकार किया गया है, इस प्रकार निबन्धोंमें व्यवहार होता है, वह
केवल इसीलिए होता है कि 'तत्' और 'त्वम्' शब्दकी केवल चैतन्यमें लक्षणा स्वीकार करके
वाक्यार्थबोध माननेसे प्रत्यक्षके साथ विरोधका भी परिहार हो जाता है ।


‡ तात्पर्यार्थ यह है कि 'समिधो यजति' इत्यादिसे अवगत समिध्, प्रयाज आदिका दर्श-
पूर्णमासके साथ अन्वय अवश्य होता है, क्योंकि उनका परस्पर उपजीव्योपजीवकभाव है,
परन्तु 'समिधो यजति' इत्यादि जितने अङ्गविधिवाक्य हैं, वे पहले स्वार्थकी प्रमितिमें अन्यार्थ-
रूपसे अवश्य प्रमित होंगे, पीछे उनका देश आदिके साथ सम्बन्ध होगा, वैसे ही अर्थवाद-
वाक्य भी स्वार्थांशमें पूर्वमें प्रमित होते हैं अनन्तर उनका स्वार्थज्ञानमात्रसे कोई फल न
होनेके कारण विधेयके स्तावकरूपसे विधिके साथ एकवाक्यताकी कल्पना करते हैं, इसलिए
अर्थवादवाक्योंका भी विधिके साथ अन्वयके पूर्वमें स्वरसतः प्रतीयमान देवताके शरीर आदिके
संसर्गमें अवान्तर तात्पर्य है ।

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