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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 315 of 590

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Page 315

प्रत्यक्षसे श्रुतिका प्रावल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८५


तात्पर्य्येऽपि कृष्णले रूपरसपरावृत्तिप्रादुर्भावपर्य्यन्तमुख्यश्रपणसम्बन्धः प्रत्यक्ष-विरुद्ध इति तदविरोधाय श्रपणशब्दस्य उष्णीकरणमात्रे लक्षणाभ्युपगमात् ।

'तत्त्वमसि' इति वाक्यस्य जीवब्रह्माभेदप्रतिपादने तात्पर्य्येऽपि त्वम्पदवाच्यस्य तत्पदवाच्याभेदः प्रत्यक्षविरुद्ध इति तदविरोधाय निष्कृष्टचैतन्ये लक्षणाभ्युपगमाच्च ।


छोटे माषोंका पाक करे ) * इस विधिका तात्पर्य यद्यपि कृष्णलोंके अङ्गभूत श्रपणमें ही है, तथापि कृष्णलोंमें मुख्यपाकका सम्बन्ध—जो कि रूप और रसकी परावृत्तिके प्रादुर्भावपर्य्यन्त है, प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे—नहीं हो सकता है, इसलिए उसके अविरोधके लिए श्रपणशब्दकी उष्णीकरणमात्रमें लक्षणाका स्वीकार है ।

† और 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्योंका जीव और ब्रह्मके अभेद प्रतिपादनमें तात्पर्य होनेपर भी, 'त्वम्पद' वाच्य जीवका 'तत्पद' वाच्य ब्रह्मके साथ अभेद प्रत्यक्षविरुद्ध है, अतः उसके अविरोधके लिए विशिष्टरूप वाच्यसे अर्थसे—अलग किये हुए केवल विशेष्यरूप चैतन्यमें लक्षणा ‡ मानी जाती है ।


* प्रकृतमें कृष्णलशब्दका अर्थ सुवर्णके विकारभूत माप किया गया है, और 'कृष्णलं श्रपयेत्' इत्यादिसे कृष्णलके अङ्गभूत श्रपण (पाक) का विधान किया जाता है। परन्तु कृष्णलका मुख्य पाक नहीं हो सकता है, क्योंकि रूपरसपरावृत्तिपर्य्यन्त अधिश्रयणादि व्यापार अर्थात् पूर्वके रूप और रस आदिके विनाशपूर्वक अन्यरूप और अन्य रस आदिकी उत्पत्ति तक अधिश्रयण आदि व्यापार ही मुख्य श्रपणशब्दका अर्थ है, और इस पाकके साथ कृष्णलका वस्तुतः सम्बन्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि कृष्णलोंमें अधिश्रयण (पाकानुकूल व्यापार) आदिके करनेपर भी रूपरसादिकी परावृत्ति या प्रादुर्भाव नहीं देखा जाता है।

† 'कृष्णलं श्रपयेत्' इस श्रुतिसे श्रपणका ही विधान होता है, और वह प्रत्यक्षसे बाधित भी नहीं है, क्योंकि ज्वालाधिश्रयण आदि क्रियारूप पाककी ही श्रपणशब्दसे विवक्षा है, इसलिए कृष्णलमें यह पाक हो सकता है, पूर्वरूपपरावृत्ति या प्रादुर्भाव धात्वर्थके अन्तर्गत नहीं होनेसे उसके न रहनेपर भी कोई हानि नहीं है, किन्तु कर्मत्वरूप पाकका फल वह द्वितीयार्थ ही है, और जो फल होता है, वह विधिके योग्य नहीं होता है, इसलिए वह विधेयभूत श्रपणात्मक भी नहीं है, इस अवस्थामें विधेयभूत श्रपणका कोई दृष्टफल न होनेसे अदृष्टार्थक ही पर्यवसन्न होता है, अतः श्रुतिके तात्पर्यके विषयीभूत श्रपणमें कोई प्रत्यक्ष विरोध न होनेसे उसमें श्रपणशब्दकी लक्षणा करना व्यर्थ है, इस प्रकार यदि किसीको शङ्का हो, तो उसके लिए 'तत्त्वमसि' इत्यादिसे अन्य दृष्टान्त कहते हैं।

‡ तात्पर्य यह है कि 'तत्त्वमसि' आदि जितने महावाक्य हैं, उन सबका तात्पर्य अखण्ड,