सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८७
परमवान्तरतात्पर्यानभ्युपगमादिति विवरणाचार्यैर्न्यायनिर्णये व्यवस्थापनेनं 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादीनामपि मुख्यार्थतात्पर्यप्रसक्तौ प्रत्यक्षाविरो-धायैव लक्षणाऽभ्युपगमाच्च ।
कथं तर्हि श्रुतेः प्राबल्यम् ? उच्यते-निर्दोषत्वात् परत्वाच्च श्रुति-मात्रस्य प्रत्यक्षात् प्राबल्यमित्युत्सर्गः किन्तु श्रुतिबाधितमपि प्रत्यक्षं कथं-
एकवाक्यता है, पदैकवाक्यतामें * ही अवान्तरतात्पर्यका अभ्युपगम नहीं माना जाता है, ऐसी विवरणाचार्यने न्यायनिर्णयमें व्यवस्था की है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इत्यादि वाक्योंका मुख्य अर्थमें तात्पर्यकी प्रसक्ति होनेपर प्रत्यक्षके साथ विरोध होगा, अतः उसकी निवृत्ति करनेके लिए ही लक्षणा मानी गई है।
तब श्रुति प्रबल कैसे होती है ? निर्दोष होनेसे और प्रत्यक्षकी अपेक्षासे पर होनेसे, ऐसा कहते हैं। सम्पूर्ण श्रुति प्रत्यक्षकी अपेक्षासे प्रबल है, यह नियम उत्सर्ग—सामान्य है, [ तात्पर्य यह है कि श्रुति और उससे भिन्न प्रमाणोंकी जहाँ परस्पर विप्रतिपत्ति ( विरोध ) होती है, वहींपर श्रुति बलवती है और जहाँ, श्रुतिबाधित प्रत्यक्ष प्रमाण अवकाशरहित होता है, वहाँ निरवकाश प्रमाणसे श्रुतिका बाध होता है, क्योंकि यह एक नियम है कि सावकाश और निरवकाशमें निरवकाश प्रमाण ही बलवान् होता है, ] किन्तु श्रुतिसे यद्यपि प्रत्यक्षका बाध किया गया हो, तथापि उसकी उचित विषयके
- वाक्योंके होनेपर ही वाक्योंकी विधिवाक्यके साथ एकवाक्यता मानी गई है, कारण कि वाक्योंका वाक्यार्थमें ही स्वभावतः तात्पर्य है। पदोंके होनेपर ही एक वाक्यार्थके बोधनसे एकवाक्यता होती है, अतः पदैकवाक्यता कहलाती है। इस पदैकवाक्यतामें जो पदार्थ हैं, वे वाक्यार्थके समान अपूर्व नहीं हैं, अतः उनका अवान्तर तात्पर्य भी नहीं है, इसीसे रेवत्याधारकवारवन्तीयसामरूप विशेषणमें भी तात्पर्य है, यह समझना चाहिए, क्योंकि स्वभावतः वाक्यार्थमें ही वाक्यका तात्पर्य है, विशिष्टविधिका तात्पर्य विशिष्टभावनामें है, अतः उसका विशेषणमें भी तात्पर्य अर्थतः सिद्ध होता है। यदि विशिष्ट विधिका तात्पर्य केवल विशेषणमें माना जाय, तो उसके विशिष्टविषयकत्वकी सिद्धि नहीं होगी, मीमांसकोंके यहाँ 'विशिष्टविधिका विशेषणमें तात्पर्य नहीं है' इस प्रकारका व्यवहार प्रत्येकमें विशिष्टविधिकी विषयता नहीं है, इसी तात्पर्यसे होता है, 'तात्पर्यविषयमें ही वेद प्रमाणज्ञानका जनक है' इस प्रकारके नियम न्यायनिर्णयमें विवरणाचार्यने भी माना है, अतः 'यजमानः प्रस्तरः' इसका प्रस्तराभेदमें यदि तात्पर्य माना जाय, तो प्रत्यक्षसे बाधित होगा, अतः उसके साथ विरोध न हो, इसलिए उसकी लक्षणा मानी जाती है, यह भाव है।