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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 314 of 590

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Page 314
२८४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ द्वितीय परिच्छेद

विशिष्टं विधेयमित्युपगमे तस्य विधेयस्य ‘दध्ना जुहोति’ इत्यादौ विधेयस्य दध्यादेरिव लोकसिद्धत्वाभावेन विधिपराद्वाक्यादेव रेवत्याधारवारवन्तीयविशेषणस्येव विना तात्पर्यं सिद्धिरेष्टव्या । नहि तात्पर्यविरहितादागमाद्यागसोमलताभेदग्राहिप्रत्यक्षविरुद्धार्थः सिध्यतीति तत्राऽपि तद्विरोधाय मत्वर्थलक्षणाश्रयणम् ।

अद्वैतश्रुतिस्तु उपक्रमोपसंहारैकरूप्यादिषड्विधलिङ्गावगमिताद्वैततात्पर्या प्रत्यक्षाद् बलवतीति ततः प्रत्यक्षस्यैव बाधः, न तद्विरोधाय श्रुतेरन्यथानयनमिति ।

कथंचिद्विषयप्राप्त्या मानान्तरसमर्थने ॥
श्रुतिर्बलीयसी नो चेद्विपरीतं वलावलम् ॥१०॥

यदि प्रत्यक्ष आदिकी व्यावहारिक विषयोंसे उपपत्ति हो सकती है, अतः प्रत्यक्ष आदिकी अपेक्षा श्रुति ही बलवती है । व्यावहारिक विषयोंसे प्रत्यक्ष आदिकी उपपत्ति न हो, तो बल और अबल विपरीत होंगे याने निरवकाश होनेसे श्रुतिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष आदि ही बलवान् होंगे ॥१०॥

विवरणवार्तिके तु प्रतिपादितम्—न तात्पर्यवत्त्वेन श्रुतेः प्रत्यक्षात् प्राबल्यम् । ‘कृष्णलं श्रपयेद्’ इति विधेः श्रपणस्य कृष्णलार्थत्वप्रतिपादने विशिष्टका विधान मानेंगे, तो उस विधेयकी अर्थात् सोमसे अभिन्न यागरूप विशिष्टकी—‘दध्ना जुहोति’ (दधिसे होम करे) इत्यादिमें विधेय दधिके समान लोकसे—सिद्धि न होनेके कारण, रेवती ऋचा है आधार जिसका, ऐसे वारवन्तीय सामरूप विशेषणके समान तात्पर्यके विना ही विशिष्टविधायकवाक्यसे उसकी सिद्धि माननी होगी, परन्तु तात्पर्यरहित आगमसे—सोमलतासे भेदको ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षसे विरुद्ध अर्थ—सिद्ध नहीं हो सकता है, अतः ‘सोमेन यजेत’ इत्यादि स्थलमें भी प्रत्यक्षके साथ विरोध न आवे, इसलिए मत्वर्थमें लक्षणाका आश्रयण होता है ।

अद्वैतब्रह्मका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका तो उपक्रम और उपसंहारके ऐक्य आदि छः लिङ्गोंसे अद्वैतमें ही तात्पर्य जाना जाता है, अतः प्रत्यक्षसे श्रुति बलवती है, इसलिए अद्वैतश्रुतिसे प्रत्यक्षका ही बाध होता है, अतः प्रत्यक्षके साथ अविरोधके लिए अद्वैतश्रुतिका गौण अर्थ नहीं कर सकते हैं ।

विवरणवार्तिकमें, तो प्रतिपादन किया गया है कि तात्पर्यवती श्रुतिका भी प्रत्यक्षसे प्राबल्य नहीं है, क्योंकि ‘कृष्णलं श्रपयेत्’ (सोनेके बने हुए छोटे-