सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षसे श्रुतिका प्राबल्य-विचार] भाषानुवादसहित २८३
प्रामाण्यं वक्तव्यम् । अथ च न तत्र तात्पर्यम् । उभयत्र तात्पर्ये वाक्यभेदापत्तेः ।
एवमर्थवादानामपि विधेयस्तुतिपराणां स्तुतिद्वारभूतेऽर्थे न तात्पर्यमिति तेभ्यः प्रत्यक्षस्यैव बलवत्त्वात् तद्विरोधाय तेषु वृत्त्यन्तरकल्पनम् । 'सोमेन यजेत' इत्यत्र विशिष्टविधिपरे वाक्ये सोमद्रव्याभिन्नयागरूपं
बोधक वाक्यमें ही विशेषणके स्वरूपमें भी प्रामाण्य कहना चाहिए, यदि कहोगे कि वहां तात्पर्य नहीं है, तो दोनों जगहोंमें तात्पर्यको माननेसे वाक्यभेदकी आपत्ति * प्रसक्त होगी ।
विशिष्टविधिके विशेषणस्वरूपके समान अर्थात् जैसे विशिष्टविधि-बोधकवाक्यका विशिष्टद्वारा विशेषणांशमें प्रामाण्य है, स्वतः नहीं है, वैसे अर्थ-वाद वाक्योंका भी, जो विधेयभूत अर्थके स्तावक हैं, स्तुतिद्वारभूत अर्थमें, तात्पर्य नहीं है [तथापि देवताओंके शरीर आदिके ज्ञानके प्रति कारण हो सकते हैं] †, इसलिए तात्पर्यरहित उन मन्त्र और अर्थवादोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षप्रमाण ही बलवान् है, अतः उनके ( प्रत्यक्ष आदिके ) साथ अविरोधके लिए मन्त्र और अर्थवाद आदिकी अन्यवृत्ति माननी चाहिए । 'सोमेन यजेत' इत्यादि विशिष्टविधिके बोधकवाक्यमें यदि 'सोमलतारूप द्रव्यसे अभिन्न यागरूप
पक्ष मानें, तो विधिका आक्षेप हो ही नहीं सकता है, क्योंकि जो प्रमित है अर्थात् जिसका यथार्थ ज्ञान हुआ है, ऐसा द्रव्यदेवतासम्बन्धयागविधिका आक्षेपक होता है, इस अवस्था में विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप है, इस प्रकार जो कहनेवाला है उसको आक्षेपसे पूर्वमें विशेषणको जानना चाहिए, उसका प्रमापक कौन है ? इस शङ्कामें आप कल्पित विधिको ही प्रमापक मानेंगे, इससे आक्षिप्तविधिसे विशेषणस्वरूपके ज्ञात होनेपर प्रकृत विधि विशिष्ट विषयक होगी और उस विधिके विशिष्टविषयक होनेपर उस विशिष्टविधिसे विशेषणविधिका आक्षेप होगा, इसलिए परस्पराश्रय दोषकी प्रसक्ति होनेसे विशेषणविधिका आक्षेप ही असिद्ध होगा ।
* यदि प्रकृतमें कोई शङ्का करे कि 'यत्परः शब्द स वाक्यार्थः' (वही शब्दका अर्थ होता है जो शब्द तात्पर्यसे गम्य होता है ) इस नियमके अनुसार उक्त वाक्योंका तथाकथित अर्थोंमें (विशेषण आदि अर्थोंमें) तात्पर्य न होनेसे उनका बोध नहीं होना चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि 'यत्परः' इत्यादि नियम औत्सर्गिक है, और गौरवसे बाध भी होता है, यह भाव है ।
† इसलिए जैसे तात्पर्यके अविषय रेवती वारवन्तीय विशेषणस्वरूप अर्थमें भी श्रुति प्रमा उत्पन्न करती है, वैसे अन्यपरक मन्त्र भी देवताके शरीर आदिका बोध करते हैं, अतः देवताधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।