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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 303 of 590

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Page 303

प्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्व-विचार] भाषानुवादसहित २७३

नामिव भूयोविषयत्वाल्पविषयत्वादिरूपोत्कर्षापकर्षासम्भवाद्, विधान्तरेण तत्सम्भवेऽपि प्रपञ्चस्य ब्रह्मज्ञानबाध्यत्वश्रुत्यन्तरैकार्थ्याद् उक्तोत्कर्षापकर्षे एव पर्यवसानाच्च प्रत्यक्षग्राह्यं घटादिसत्यत्वं यावद्ब्रह्मज्ञानमबाध्यत्वरूपमिति न मिथ्यात्वश्रुतिविरोध इत्याहुः ।

प्रत्यक्षं बाध्यमाचख्युरपच्छेदनयात् परे ।
यतः शङ्कितदोषं तन्निर्दोष बाधते श्रुतिः ॥ ७ ॥

अपच्छेद-न्यायसे प्रत्यक्ष बाधित होता है, क्योंकि जिसके विषयमें दोषकी शङ्का हो सकती है, ऐसे प्रत्यक्षका निर्दुष्ट श्रुति बाध करती है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ७ ॥


विषयीभूत नियन्तृत्व और सौन्दर्यादिके समान अधिकविषयता और न्यून-विषयता आदिरूप उत्कर्ष और अपकर्ष हो नहीं सकता है । यद्यपि त्रिकाला-बाध्यत्वरूप सत्त्वका अङ्गीकार करके अन्य रीतिसे † भी उत्कर्ष और अपकर्षका निरूपण कर सकते हैं, तथापि प्रपञ्चमें ब्रह्मज्ञानबाध्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य श्रुतिके साथ एकार्थत्वके लिए, अर्थात् उससे विरोध न हो इसलिए, तथा-कथित उत्कर्ष और अपकर्षमें ही पर्य्यवसान होनेसे प्रत्यक्षसे गृहीत होनेवाला घट आदिका सत्यत्व ब्रह्मज्ञानकी उत्पत्ति तक ही अबाध्यरूप है, अतः मिथ्या-त्वप्रतिपादक श्रुतिके साथ प्रत्यक्षादि प्रमाणका विरोध नहीं है ।


रामचन्द्रजी कामदेवके भी कामदेव हैं अर्थात् कामदेवसे भी अत्यन्त सुन्दर हैं) इस प्रयोगका अत्यन्त सौन्दर्यके बोधके लिए ही व्यवहार किया जाता है, साधारण सौन्दर्यका अर्थ उत्कृष्ट रूपादिमत्त्व और असाधारण सौन्दर्यका अर्थ उससे भी अत्युत्कृष्ट रूपादिमत्त्व है, प्रकृत स्थलमें व्यावहारिक सत्त्व और पारमार्थिक सत्त्व में भी संसारकालमें अबाध्यत्व और त्रिकालाबाध्यत्व-रूपसे उत्कृष्टत्व और अपकृष्टत्वका आपादन कर सकते हैं, यह भाव है ।

† प्रकृतमें शङ्काका भाव यह है कि केवल अबाधितत्वरूप सत्ताका अङ्गीकार करके भी अन्य प्रकारसे उत्कर्ष और अपकर्षका सम्भव हो सकता है, वह इस प्रकार है—ब्रह्म और प्रपञ्चमें त्रिकालाबाध्यतारूप सत्त्व समान है, परन्तु ब्रह्ममें त्रिकालाबाध्यत्व श्रुतिगम्य है और प्रपञ्चमें लौकिक प्रमाणगम्य है, अतः वैदिकप्रमाणगम्य होनेसे ब्रह्मका सत्त्व उत्कृष्ट है और प्रपञ्चका सत्त्व लौकिकप्रमाणवेद्य होनेसे अपकृष्ट है, इस परिस्थितिमें मिथ्यात्वविरुद्ध सत्त्वका प्रपञ्चमें प्रत्यक्षादिसे ग्रहण होनेके कारण विरोध हो सकता है, इसपर कहा गया कि 'प्राणा वै सत्यम्' इत्यादि श्रुतिमे यदि लौकिक प्रपञ्चमें त्रिकालाबाधित सत्ताका ही ग्रहण किया जाय, तो लौकिक प्रपञ्चमें असत्यत्वका प्रतिपादन करनेवाली अन्य श्रुतिके साथ विरोध होगा, अतः उक्त उत्कर्षा-पकर्ष नहीं कर सकते हैं, यह भाव है ।

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