सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context२७२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद
वा, तस्य देशकालसम्बन्धो वा, तत्र जात्यादिकं वा नाभ्युपगम्यते, किन्तु तेषामबाध्यत्वम्। न चाबाध्यत्वमेव सत्त्वं प्रत्यक्षग्राह्यमस्त्वितिवाच्यम्, 'कालत्रयेऽपि नाऽस्य बाधः' इति वर्तमानमात्रग्राहिणा प्रत्यक्षेण ग्रहीतुमशक्यत्वादित्याहुः।
अयावज्ज्ञानबाध्यत्वमबाध्यत्वमिति द्विधा।
सत्त्वयोर्भेदमाश्रित्याविरोधमितरे जगुः ॥ ६ ॥
कुछ-कालतक अर्थात् ब्रह्मज्ञानपर्यन्त अबाध्यत्वरूप सत्ताके दो भेद मान करके प्रत्यक्ष और श्रुतिके अविरोधका समाधान कोई लोग करते हैं ॥ ६ ॥
अन्ये तु—अबाध्यत्वरूपसत्यत्वस्य प्रत्यक्षग्राह्यत्वेऽपि 'प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्' इतिश्रुत्या प्रधानभूतप्राणग्रहणोपलक्षितस्य कृत्स्नस्य प्रपञ्चस्य ब्रह्मणश्च सत्यत्वोत्कर्षापकर्षप्रतीतेः, सत्यत्वे चाबाध्यत्वरूपे सर्वदैवाबाध्यत्वं किञ्चित्कालमबाध्यत्वमित्येवंविधोत्कर्षापकर्षं विना 'राजराजो मन्मथमन्मथः' इत्यादिशब्दतात्पर्यगोचरनियन्तृत्वसौन्दर्यादी-
अबाध्यत्वरूप सत्त्वका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण क्यों नहीं होता है ? तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'तीनों कालोंमें इस विषयका बाध नहीं है, इस प्रकार अबाध्यत्वका प्रत्यक्षसे, जो कि केवल वर्तमान विषयका ही ग्रहण करनेमें पटु है, ग्रहण नहीं हो सकता है।
और कुछ लोग कहते हैं कि कदाचित् यह मान भी लिया जाय, कि घटादिमें अबाध्यत्वरूप सत्ताका ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, तो भी 'प्राणा वै सत्यम्०' ( प्राण सत्य हैं ) इत्यादि श्रुतिसे सूत्रात्मक जगत्के विधारक मुख्य प्राणसे उपलक्षित सम्पूर्ण प्रपञ्च और ब्रह्ममें सत्यत्वका उत्कर्ष और अपकर्ष प्रतीत होता है। यदि अबाध्यत्वरूप ही सत्यत्व है, तो सर्वदा अबाध्यत्व और कुछ कालतक अबाध्यत्व, इस प्रकार उत्कर्ष और अपकर्षकी कल्पनाके विना, 'राजराजः' और 'मन्मथमन्मथः' * इत्यादि शब्दोंके तात्पर्य
* राजशब्दका अर्थ है—पालकत्वरूप नियामकत्व, और वह पाल्य (जिसका पालन किया जाय) वस्तुसे सापेक्ष है, इस अवस्था में 'विष्णुशर्मा राजराजः' (विष्णुशर्मा राजाका भी राजा है) ऐसे प्रयोगमें विष्णुशर्माका अन्य राजाओंकी अपेक्षासे कुछ उत्कर्ष सूचित होता है और अन्य राजाओंमें अपकर्ष सूचित होता है, वे उत्कर्ष और अपकर्ष पालनके अधिकदेशविषयकत्व और अल्पदेशविषयकत्वरूप हैं, इसी प्रकार 'श्रीरामः मन्मथमन्मथः' (भगवान्