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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 304 of 590

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Page 304

२७४ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ द्वितीय परिच्छेद


अपरे तु—प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसत्यत्वग्राहिणोः श्रुतिप्रत्यक्षयोर्विरोधेऽपि दोषशङ्काकलङ्कितात् प्रथमप्रवृत्तात् प्रत्यक्षाद् निर्दोषत्वादपच्छेदन्यायेन परत्वाच्च श्रुतिरेव बलीयसी ।
'प्राबल्यमागमस्यैव जात्या तेषु त्रिषु स्मृतम्' इति स्मरणाच्च ।
न च वैदैकगम्यार्थविषयकमिदं स्मरणम्, तत्र प्रत्यक्षविरोधशङ्काऽभावेन शङ्कितप्रत्यक्षविरोधे एव वेदार्थे वेदस्य प्राबल्योक्त्यौचित्यात् ।


❊ कुछ लोग कहते हैं—प्रपञ्चमें मिथ्यात्व और सत्यत्वका ग्रहण करनेवाले श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षप्रमाणका परस्पर विरोध होनेपर भी दोषकी आशङ्कासे कलङ्कित, तथा प्रथम प्रवृत्त प्रत्यक्षसे निर्दुष्ट होनेके कारण और अपच्छेदन्यायसे पर होनेके कारण श्रुति ही बलवती है, अतः श्रुतिका प्रत्यक्षसे बाध नहीं हो सकता है, यह भाव है।
और 'प्राबल्यम्०' (आगम होने से ही प्रत्यक्ष आदि तीनों प्रमाणोंमें से आगमप्रमाण बलवान् है, यह प्रसिद्ध है) इस प्रकार शास्त्रके बलवत्तर प्रामाण्यमें स्मृति भी प्रमाण है।
यदि शङ्का हो कि केवल वेदगम्य अर्थोंमें ही उक्त स्मृति है, अर्थात् उक्त स्मृतिवाक्य उसी आगमको बलवत्तर कहता है, जो वैदैकगम्य स्वर्गसाधनत्वादिका प्रतिपादन करते हैं, मिथ्यात्व केवल वेदगम्य नहीं है, क्योंकि अनुमानादिसे भी मिथ्यात्वकी सिद्धि होती है, अतः मिथ्यात्वप्रतिपादक श्रुतिमें उक्त स्मृतिसे प्रबलता सिद्ध नहीं होगी ? तो यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि वैदैकगम्य पदार्थमें प्रत्यक्षसे विरोधकी शङ्काका उदय ही न होगा, अतः [ उक्त वचनको वैदैकगम्य अर्थविषयक माननेमें प्राबल्य-बोधक वचन व्यर्थ हो जायगा, इससे ] जिस वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षके साथ विरोध शङ्कित हो, † उसी वेदार्थमें वेदको प्रबल कहना उचित है।


* इन लोगोंके मतमें घटादिनिष्ठ सत्त्व त्रिकालाबाध्यरूप ही है, और उसी सत्ताका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, अतः प्रत्यक्ष और आगमका अवश्य ही विरोध है, तथापि पर होनेसे अपच्छेदन्यायसे प्रत्यक्षका आगम बाध करता है, यह विशेष है। अपच्छेदन्यायका आगे वर्णन किया जायगा।
† शङ्कितप्रत्यक्षविरोध—शङ्कितः प्रत्यक्षेण सह विरोधो यस्य मिथ्यात्वरूपस्य वेदार्थस्य स तथा, इस व्युत्पत्तिसे जिस मिथ्यात्व आदि वेदोक्त अर्थका प्रत्यक्षसे विरोध शङ्कित हो वही

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