सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in contextप्रत्यक्षसे अद्वैतश्रुतिका अबाधितत्वविचार ] भाषानुवादसहित २७१
जातिकालादिकं सत्त्वमिष्टमध्यक्षगोचरः ।
नहि तच्छ्रौतमिथ्यात्वाविरुद्धमिति केचन ॥ ५ ॥
जातिरूप या देश, कालादि सम्बन्धस्वरूप सत्त्व प्रत्यक्षका गोचर है, अतः श्रुतिसे प्रतिपादित मिथ्यात्वसे प्रत्यक्षका विरोध नहीं है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ॥ ५ ॥
केचित्तु—घटादिसत्त्वग्राहिणः प्रत्यक्षस्य प्रामाण्ये ब्रह्मप्रमाणन्यूनताऽनवगमेऽपि तद्ग्राह्यं सत्त्वमनुगतप्रत्ययात् सत्ताजातिरूपं वा, 'इहेदानीं घटोऽस्ति' इति देशकालसम्बन्धप्रतीतेः तत्तद्देशकालसम्बन्धरूपं वा, 'नास्ति घटः' इति स्वरूपनिषेधप्रतीतेर्घटादिस्वरूपं वा पर्यवस्यति । तच्च स्वमिथ्यात्वेन न विरुध्यते । नहि मिथ्यात्ववादिनाऽपि घटादेः स्वरूपं
* कुछ लोग कहते हैं कि यद्यपि घट आदि पदार्थोंकी सत्ता ग्रहण करनेवाले प्रत्यक्षके प्रामाण्यमें ब्रह्मप्रतिपादक श्रुतिप्रमाणोंसे स्वल्प भी न्यूनता नहीं है, तथापि प्रत्यक्षप्रमाणसे ग्रहण किया जानेवाला सत्त्व 'घटः सन्, पटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्यय होनेसे सत्ता जातिरूप ही है, अथवा यहाँ इस समय घट है, इस प्रकारसे घट आदिमें देश, कालके सम्बन्धकी प्रतीति होनेसे, तत्-तत् देशकालके सम्बन्धरूप ही है, अथवा 'घट नहीं है' इस प्रकार घटके स्वरूपनिषेधकी प्रतीतिसे घटादिस्वरूप ही है । परन्तु वह सत्त्वके मिथ्या होनेपर भी विरुद्ध नहीं है, क्योंकि मिथ्यात्वका प्रतिपादन करनेवाला भी घटादिका स्वरूप, उसका देशकालसंसर्ग अथवा घट आदिमें जाति आदि नहीं मानता है, ऐसा नहीं है, किन्तु उनमें अबाध्यत्व ही नहीं मानता है। यदि शङ्का हो कि
अभिभावक है, इस प्रकार आत्माके ज्ञातव्यमें विशेष योग्यताका सूचन करनेके लिए 'द्रष्टव्यः' में तव्यप्रत्यय है, विधायक नहीं है, यह भाव है ।
* इस केचित्तुके ग्रन्थका यह भाव है कि जैसे श्रुति यथार्थ वस्तुका ही ग्रहण करती है, वैसे प्रत्यक्ष भी तात्त्विक अर्थात् सत्य ही घट आदि पदार्थका ग्रहण करता है, परन्तु घट आदिमें प्रतिभात होनेवाली सत्ता ब्रह्मसत्ता (त्रिकालाबाधित सत्ता) नहीं है, किन्तु 'घटः सन्' इत्यादि अनुगत प्रत्ययसे सिद्ध हुई सत्ता जाति ही है, अतः श्रुति और प्रत्यक्षके भिन्न-भिन्न विषय होनेके कारण प्रत्यक्षविरुद्ध होनेसे श्रुतिमें अप्रामाण्यकी शङ्का नहीं हो सकती है । और यह भी आग्रह नहीं है कि घटादिमें भासमान सत्ता जातिरूप ही है । परन्तु जातिरूप हो या देशकालसम्बन्धरूप हो या घटादिस्वरूप हो, इनको जगन्मिथ्यावादी भी व्यवहारदशामें मानता ही है, अतः विरोध नहीं है ।