Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 287 of 590

Read in context
Page 287

वृत्ति के निर्गमन की आवश्यकता का विचार] भाषानुवादसहित २५७

णान्तरसाधारणस्योपनयस्याऽसन्निकर्षत्वात्' इत्यपि शङ्का निरस्ता। संयोगा-
दिसन्निकर्षाणामननुगमेनाऽननुगमाच्च।

यत्तत्राऽभिमतमापरोक्ष्यम्, तदेव ममाऽप्यस्त्विति चेत्, न; तस्य शब्दा-
परोक्षनिरूपणप्रस्तावे प्रतिपादनीयस्य तत्रैव दर्शनीयया रीत्या अज्ञान-
निवृत्तिप्रयोज्यत्वेन तन्निवृत्तिप्रयोजकविशेषणभावायोगात्। तस्मात् 'तरति

आदिमें भी उपनीत भानके होनेसे अन्य प्रमाण साधारण उपनयमें सन्निकर्षत्व
नहीं है। और दूसरी बात यह भी है कि संयोग आदि सन्निकर्षोंका अनुगम
न होनेके कारण इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वरूप अपरोक्षत्व भी अनुगत नहीं होगा।

यदि कहो कि जो तुम (सिद्धान्ती) अपरोक्षत्व मानते हो, वही हमारे
मतमें भी होगा। [इसलिए अज्ञाननिवर्तक ज्ञानमें अपरोक्षत्व विशेषण देनेसे
परोक्षज्ञानकी निवृत्ति प्रसक्त नहीं होगी], तो यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि
शाब्दज्ञानके अपरोक्षत्वनिरूपणके प्रकरणमें प्रतिपादनीय सिद्धान्तीका अपरोक्षत्व,
उसी प्रकरणमें* प्रदर्शित रीतिसे, अज्ञाननिवृत्तिसे प्रयोज्य है, अतः वह अज्ञान-
निवृत्तिके प्रति प्रयोजक (कारण) रूपसे निवर्तक ज्ञानमें विशेषण नहीं हो
सकता है।


* ज्ञानमें जो अपरोक्षत्व है, वह करणविशेषसे प्रयुक्त नहीं है, किन्तु अपरोक्ष अर्थसे
अभिन्नत्वरूप है, और वह जो अपरोक्षार्थाभिन्नत्वरूप अपरोक्षत्व है, वह विषयावभासक
चैतन्यसमाननिष्ठ है, वृत्तिनिष्ठ नहीं है, इसलिए साक्षिप्रत्यक्षमें अव्याप्ति नहीं है, और
अर्थमें अपरोक्षत्व अर्थव्यवहारके अनुकूल चैतन्याभिन्नत्व है अर्थात् विषयके व्यवहारमें
उपयुक्त चैतन्यसे अभिन्नत्व है। विषयव्यवहारमें अनुकूल चैतन्य है—जिसका कि आवरण नष्ट
हुआ है—ऐसा उस विषयका अधिष्ठानभूत चैतन्य, इसीलिए अपने व्यवहारमें अनु-
कूल स्वगोचर वृत्तिसे अभिव्यक्त अधिष्ठानचैतन्यके साथ घटादि विषयोंका तादात्म्यरूप—
अभेद होनेके कारण उनमें अपने व्यवहारमें अनुकूल चैतन्याभिन्नत्व है। अहङ्कार आदि
स्थलोंमें भी अहङ्कारके अधिष्ठानभूत साक्षिरूप ज्ञानकी और बाह्य घट आदिमें तत्-तत् वृत्त्यु-
पहित घटादि प्रत्यक्षज्ञानात्मक जो घट आदिका अधिष्ठानभूत चैतन्य है, उसकी उन-उन
विषयोंके साथ तादात्म्यापत्ति होनेसे अपरोक्षार्थाभिन्नत्वरूप अपरोक्षत्व उपपन्न है। यह रीति
शाब्दापरोक्षप्रकरणमें बतलाई गई है। इस अवस्थामें विषयावच्छिन्न चैतन्यगत अज्ञानकी
निवृत्ति होनेपर ही घटादिव्यवहारके अनुकूल चैतन्यके साथ घटादिविषयका अभेदरूप
अपरोक्षत्व प्राप्त हो सकता है, विषय जब अपरोक्ष होगा, तब विषयके ज्ञानमें भी अपरोक्षार्था-
भिन्नत्व होगा, इसलिए विषयचैतन्यमें रहनेवाले अज्ञानकी निवृत्तिके पूर्वमें ज्ञानमें अपरो-
क्षत्वकी सिद्धि नहीं हो सकती है, अतः सिद्धान्तीका अभिमत ज्ञानगत अपरोक्षत्व, जो

३३