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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 288 of 590

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Page 288
२५८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

शोकमात्मविद्' इति श्रुतस्य ब्रह्मज्ञानस्य मूलाज्ञानाश्रयभूतसर्वोपादान-
ब्रह्मसंसर्गनियतस्य मूलाज्ञाननिवर्तकत्वात् । 'ऐन्द्रियकवृत्तयस्तत्तदिन्द्रिय-
सन्निकर्षसामर्थ्यात् तत्तद्विषयावच्छिन्नचैतन्यसंसृष्टा एव उत्पद्यन्ते' इति
नियममुपेत्याऽज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतत्वं निवर्तकज्ञानविशेषणं वाच्यम् ।
तथा च 'यद् अज्ञानं यं पुरुषं प्रति यद्विषयावरकम्, तत् तदीय तद्विषयतद्-
ज्ञानाश्रयचैतन्यसंसर्गनियतात्मलाभज्ञाननिवर्त्यम्' इति ज्ञानाज्ञानयोर्विरोध-
प्रयोजकं निरूपितं भवति ।

इससे अर्थात् 'यदज्ञानं यं पुरुषं प्रति' इत्यादि नियममें अपरोक्षत्वका
निवर्तकज्ञानके विशेषणरूपसे प्रवेश नहीं हो सकनेसे 'तरति०' (आत्मज्ञानी
अज्ञानको तैर जाता है अर्थात् ज्ञानीका अज्ञान निवृत्त हो जाता है) यह
श्रुत ब्रह्मज्ञान, जो कि मूलाज्ञानके आश्रयभूत तथा सम्पूर्ण जगत्‌के प्रति
उपादानभूत ब्रह्ममें नियमतः संसृष्ट है*, मूलाज्ञानका निवर्तक है। अतः तत्-
तत् इन्द्रियोंकी सामर्थ्यसे इन्द्रियजन्य वृत्तियाँ भी तत्-तत् विषयोंसे युक्त
चैतन्यसे संसृष्ट ही उत्पन्न होती हैं, ऐसा नियम मानकर अज्ञानाश्रय चैतन्यके
संसर्गसे नियतत्व निवर्तक ज्ञानमें विशेषण देना चाहिए । इससे 'जो अज्ञान
जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरक होता है, वह † तदीय और तद्विषयक
तदज्ञानके आश्रय चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले ज्ञानसे निवर्त्य है', इस
प्रकार ज्ञान और अज्ञानके विरोधके प्रयोजकका स्वरूप निरूपित होता है ।


विषयचैतन्यगत अज्ञानकी निवृत्तिसे प्रयोज्य है, अज्ञानकी निवृत्तिमें कारण कैसे होगा, अर्थात्
कदापि नहीं हो सकता है, इसलिए वह अज्ञाननिवृत्तिके प्रति निवर्तकज्ञानका प्रयोजकत्वरूपसे
विशेषण नहीं हो सकता है, यह भाव है ।

* तात्पर्य यह है कि जब ब्रह्मविषयक ज्ञानकी (वृत्तिकी) उत्पत्ति होती है, तब
नियमतः वह ब्रह्मसंसृष्ट ही उत्पन्न होती है, क्योंकि ब्रह्म सभीका उपादान है, कार्यमात्र
जन्मसे लेकर उपादानभूत ब्रह्मके साथ संसृष्ट होता है, इसीलिए ब्रह्मविषयक वृत्तिज्ञानका भी
स्वनिवर्त्य मूलाज्ञानके आश्रयीभूत ब्रह्ममें संसर्गनियम अर्थसिद्ध है।

† घटावच्छिन्न चैतन्यमें घटको आवृत्त करनेवाले अनेक अज्ञान हैं, उनमें से कोई देवदत्तके
प्रति आवरक हैं, तो कोई यज्ञदत्तके प्रति, इस प्रकारसे प्रतिविषय पुरुषके भेदसे अनेक अज्ञान
हैं, इसलिए विषयावारक अज्ञानोंमें से जो अज्ञान जिस देवदत्तके प्रति जिस विषयको आवृत्त करता है,
वह अज्ञान उसी देवदत्तके घटविषयक उस अज्ञानके आश्रयभूत चैतन्यके संसर्गसे नियतात्मलाभवाले
(नियत है उत्पत्ति जिसकी, ऐसे) ज्ञानसे निवर्त्य है, अर्थात् देवदत्तके प्रति घटावारक जो अज्ञान है, उसका


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