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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 286 of 590

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Page 286
२५६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

सामर्थ्यादिन्द्रियस्यैव जनकत्वात्, अनुगतजन्यतावच्छेदकाग्रहेणाऽनेकेष्वि-
न्द्रियजन्यत्वस्य दुर्ग्रहत्वाच्च । तद्ग्रहे च तस्यैव प्रथमप्रतीतस्याऽपरोक्षरूप-
त्वोपपत्तौ प्रत्यक्षानुभवायोज्यस्य इन्द्रियजन्यत्वस्य तद्योग्यापरोक्षरूपत्व-
कल्पनायोगात् ।
एतेन 'इन्द्रियसन्निकर्षजन्यत्वमापरोक्ष्यम् । उपनयसहकृतेन्द्रियजन्य-
परोक्षांशे च न सन्निकर्षजन्यत्वम् । अनुमितावप्युपनीतभानसत्त्वेन प्रमा-


अनुमितिमें जैसे मन करण है, वैसे ही प्रकृतमें इन्द्रियाँ करण हैं । और अनुगत इन्द्रियजन्यतावच्छेदकका ग्रह न होनेके कारण अनेक अपरोक्ष ज्ञानोंमें इन्द्रिय-जन्यत्वका ग्रह भी नहीं हो सकता है । यदि 'अहं साक्षात्करोमि' ( मैं साक्षात्कार करता हूँ ) इत्यादि अनुभवसे सिद्ध कोई अनुगत जन्यतावच्छेदक माना जाय, तो वह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रथमतः प्रतीयमान वही धर्म* अपरोक्षत्व हो सकेगा तो प्रत्यक्ष अनुभवके अयोग्य इन्द्रियजन्यत्वमें उस अनुभवके योग्य अपरोक्षत्वकी कल्पना असङ्गत होगी ।

अव्याप्ति आदि दोषोंके होनेसे यह भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि इन्द्रिय-सन्निकर्षजन्यत्वरूप अपरोक्षत्व† है, उपनयसहित इन्द्रियसे जन्य परोक्ष-अंशमें सन्निकर्षजन्यता नहीं है, अतः गुरुत्व आदिमें दोष नहीं है, अनुमिति


* अवच्छेदकरूप जन्यत्वके ज्ञानके पूर्व अवच्छेदकका ज्ञान अपेक्षित होता है, अतः 'साक्षात्कार करता हूँ' इत्यादि प्रतीतिरूप अनुभवके योग्य जन्यतावच्छेदकरूपसे स्वीकृत जो धर्म है, उसीमें अपरोक्षत्वकी उपपत्ति हो सकती है, फिर अयोग्य इन्द्रियजन्यत्वको अपरोक्षत्वरूप माननेकी आवश्यकता नहीं है । यदि शङ्का हो कि वही जन्यतावच्छेदक उपाधि अपरोक्षत्वरूप हो, तो वह युक्त नहीं है, क्योंकि वह उपाधि व्याप्यवृत्ति है या अव्याप्यवृत्ति ? यदि प्रथम पक्ष माना जाय, तो 'दण्डी अयम् आसीत्' इत्यादिमें दण्डादि अंशमें व्यभिचार होगा, यदि द्वितीयपक्षका अवलम्बन किया जाय, तो अवच्छेदक उपाधिका निरूपण दुर्घट होनेसे अव्याप्य-वृत्तित्व ही नहीं होगा, अतः उस जन्यतावच्छेदकको अपरोक्षत्व नहीं कह सकते हैं ।

† इन्द्रिय और अर्थके सम्बन्धसे होनेवाला ज्ञान अपरोक्ष है, जैसे—घटविषय—अर्थ है उसके साथ इन्द्रियका सम्बन्ध होनेसे अर्थात् संयोगसम्बन्ध होनेसे 'घटं साक्षात्करोमि' ( घटका साक्षात्कार करता हूँ ) ऐसा अनुभव होता है । ये सन्निकर्ष संयोग, संयुक्तसमवाय, संयुक्तसमवेतसमवाय, समवाय, समवेतसमवाय और स्वरूपसम्बन्ध, इस प्रकारसे छः हैं, इनका द्रव्य, गुण, गुणत्व, शब्द, शब्दत्व और अभाव आदिके प्रत्यक्षमें क्रमशः उपयोग न्यायमतमें माना गया है । इसलिए इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यत्व अपरोक्षत्व हो सकता है, यह पूर्वपक्षीका अभिप्राय है ।


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