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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 189 of 590

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Page 189

आवरणाभिभव-स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १५९


वृत्तिनाश्यं परे वृत्तिसमसङ्ख्यं प्रचक्षते ।
अवस्थाज्ञानमज्ञानं नष्टमित्यनुभूतितः ॥ ७५ ॥

वृत्तिसे नष्ट होनेवाले और संख्यामें वृत्तिके बराबर अवस्थारूप अज्ञान अनेक हैं, क्योंकि 'एक अज्ञान नष्ट हुआ' ऐसा अनुभव होता है, यहाँ वृत्तिसे अवस्थारूप अज्ञानका विनाश आवरणभंग है ॥ ७५ ॥

अपरे तु—‘घटं न जानामि’ इति घटज्ञानविरोधित्वेन, घटज्ञाने सति घटाज्ञानं निवृत्तमिति तन्निवर्त्यत्वेन चाऽनुभूयमानं न मूलाज्ञानम् । शुद्धचैतन्यविषयस्य तज्ज्ञाननिवर्त्यस्य च तस्य तथात्वायोगात् । किन्तु घटावच्छिन्नचैतन्यविषयं मूलाज्ञानस्यावस्थाभेदरूपमज्ञानान्तरमिति तन्नाश एवाऽभिभवः । न चैवमेकेन ज्ञानेन तन्नाशे तत्समानविषयाणां ज्ञानान्तराणामावरणाभिभावकत्वानापत्तिः । यावन्ति ज्ञानानि, तावन्ति अज्ञानानीत्यभ्युपगमादित्याहुः ।


आश्रय करता ही है, परन्तु वह अज्ञान उसको आवृत नहीं करता, यह भी ज्ञात होता है, [ अतः पटदृष्टान्तसे यह विलक्षण है, और दहराधिकरणमें जीवको आवृत माननेमें सभी व्यवहारोंकी लोपप्रसक्ति होगी, ऐसा साधन किया है, और इस ग्रन्थमें साक्षी चैतन्यकी अनावृति भी कहेंगे, यह भाव है ]

कुछ लोग कहते हैं कि ‘घटं न जानामि’ ( मैं घटको नहीं जानता हूँ ) इस प्रकार घटज्ञानके विरोधीरूपसे और ‘घटज्ञान होनेपर घटका अज्ञान निवृत्त हुआ’ इस प्रकार घटज्ञानके निवर्त्यरूपसे अनुभूयमान अज्ञान मूलाज्ञान नहीं है, कारण कि शुद्धचैतन्यविषयक शुद्धचैतन्यज्ञानसे निवृत्त होनेवाला अज्ञान घटावच्छिन्नचैतन्यविषयक और घटज्ञानसे निवर्त्य नहीं हो सकता । परन्तु घटावच्छिन्न चैतन्यको अवलम्बन करनेवाले मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष कोई अन्य ही अज्ञान है, इसलिए उस अवस्थाविशेषरूप अज्ञानका विनाश ही आवरणाभिभव है । एक ज्ञानसे अवस्थारूप अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक अन्य ज्ञान आवरणके नाशक नहीं होंगे, यह आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि जितने ( संसारमें ) ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान भी हैं, ऐसा स्वीकार है ।