सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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पुनः कन्दलनादन्येऽनावृतिं वृत्त्यनेहसम् ।
अज्ञोऽहमिति विज्ञानात् स्वाश्रितेनाऽप्यनावृतिम् ॥ ७४ ॥
पुनः आवरणके होनेसे वृत्तिकालपर्य्यन्त विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न रहना ही आवरणभंग है। 'मैं अज्ञ हूँ' इत्यादि अनुभवसे अहमर्थके अज्ञानाश्रय होनेपर भी अहमर्थको वह आवृत नहीं करता है ॥ ७४ ॥
अन्ये तु—अज्ञानस्यैकदेशेन नाशे उपादानाभावात् पुनस्तत्र कन्दलनायोगेन संकृदपगते समयान्तरेऽप्यावरणाभावप्रसङ्गात्, निष्क्रियस्याऽपसरणसंवेष्टनयोरसम्भवाच्च न यथोक्तरूपोऽभिभवः सम्भवति । अतः चैतन्यमात्रावारकस्याऽप्यज्ञानस्य तत्तदाकारवृत्तिसंसृष्टावस्थविषयावच्छिन्नचैतन्यानावारकत्वस्वाभाव्यमेवाभिभवः । न च विषयावगुण्ठनपटवद्विषयचैतन्यमाश्रित्य स्थितस्याज्ञानस्य कथं तदनावारकत्वं युज्यते इति शङ्क्यम्, 'अहमज्ञः' इति प्रतीत्याऽहमनुभवे प्रकाशमानचैतन्यमाश्रयत एव तस्य तदनावारकत्वप्रतिपत्तेरित्याहुः ।
युद्धमें डरे हुए योद्धाके समान अज्ञान ज्ञान द्वारा विषयावच्छिन्न प्रदेशसे पलायन करता है, वही आवरणाभिभव है।
कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अज्ञानका एकदेशसे विनाश, संवेष्टन या अपसरण आवरणाभिभव नहीं है, क्योंकि अज्ञानका एकदेशसे विनाश होनेपर उपादान कारणके न रहनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य प्रदेशमें फिर आवरणकी उत्पत्ति नहीं होगी, इस प्रकार एक बार अज्ञानका नाश होनेपर अन्य समयमें भी आवरणाभावका प्रसङ्ग होगा और क्रियारहित अज्ञानका वेष्टन या अपसरण भी नहीं हो सकता है। इससे चैतन्यमात्रके आवरक ( आवरणकर्ता ) अज्ञानका तत्-तत् विषयाकार वृत्तिसे सम्पृक्त अवस्थावाले विषयावच्छिन्न चैतन्यका आवरण न करना—यह जो स्वभाव है वही स्वभाव आवरणाभिभव है । परन्तु जैसे घट आदि विषयका अवगुण्ठन करके अर्थात् घटको व्याप्तकर स्थित पट घटको आवृत करता है वैसे ही अज्ञान भी विषयचैतन्यको आवृत करेगा ही, तो यह कल्पना कैसे हो सकती है कि उसका अनावारकत्व स्वभाव है। यदि इस प्रकार शङ्का की जाय तो युक्त नहीं है, क्योंकि 'अहमज्ञः' 'मैं अज्ञ हूँ' इस प्रकार अनुभव होता है, इसलिए 'अहम्' अनुभवमें प्रकाशमान जीवचैतन्यका अज्ञान