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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 190 of 590

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Page 190
१६०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

केचिदूचुरनादीदं मूलाज्ञानमिव—
कोई लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके समान अनादि है ।

इमानि चाऽवस्थारूपाणि अज्ञानानि मूलाज्ञानवदज्ञानत्वादनादीनीति केचित् ।
इतरे ।
सादि निद्रादिवत्, तत्रानादित्वे कस्य नाश्यता ॥ ७६ ॥

अन्य लोग कहते हैं कि अवस्थारूप अज्ञान निद्रा आदिके समान सादि है, यदि अवस्थारूप अज्ञानको अनादि मानें तो नाश किसका होगा ?

व्यावहारिकौ जगज्जीवावावृत्य स्वाप्नौ जगज्जीवौ विक्षिपन्ती निद्रा तावदावरणविक्षेपशक्तियोगात् अज्ञानावस्थाभेदरूपा । तथा निद्रा सुषुप्तावस्थाऽप्यन्तःकरणादौ विलीने 'सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषम्' इति परामर्शदर्शनात् मूलाज्ञानवत् सुषुप्तिकाले अनुभूयमानाज्ञानावस्थाभेदरूपैव । तयोश्च जाग्रद्भोगप्रदकर्मोपरमे सत्येवोद्भवात् सादित्वम्, तद्वद् अन्यदप्य-


कुछ लोग यह कहते हैं कि जो ये अवस्थारूप अज्ञान हैं, वे सबके सब मूल अज्ञानके समान अनादि ही हैं, क्योंकि अज्ञानत्व धर्म अवस्थारूप अज्ञानमें भी है * ।

जाग्रत् अवस्थाके जगत् और जीवका आवरण करके स्वप्नावस्थावाले जगत् और जीवकी उत्पत्ति करती हुई निद्रा अज्ञानकी ही विशेष अवस्था है, क्योंकि निद्रामें भी आवरण और विक्षेपशक्तिका योग है । इसी प्रकार अन्तःकरण आदिके विलीन होनेपर 'मैं सुखसे सोया था, मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस प्रकारके स्मरणके देखनेसे सुषुप्तिकालमें मूलाज्ञानके समान अनुभूयमान सुषुप्ति अवस्था भी अज्ञानकी विशेष अवस्था ही है । जाग्रत्कालीन भोगके देनेवाले कर्मका क्षय होनेपर ही निद्रा और सुषुप्तिकी उत्पत्ति होती है, अतः वे सादि...


* अवस्थाऽज्ञानानि अनादीनि, अज्ञानत्वात्, मूलाज्ञानवत्, अर्थात् अवस्थारूप अज्ञान अनादि हैं, अज्ञानत्व होनेसे, मूलाज्ञानके समान, यह अनुमानप्रमाण अवस्थारूप अज्ञानके अनादित्वका साधक है । देवताधिकरणमें ( ब्र० सू० अ० १ पा० ३ सू० २६ ) इस मूल अज्ञानको अनादि सिद्ध किया है, अतः दृष्टान्तासिद्धि नहीं है ।

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