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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 173 of 590

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Page 173

वृत्तिके उपयोगका विचार ] भाषानुवादसहित १४३


इति ज्ञानजननकर्तृत्वश्रुतेरपि न कश्चिद्विरोध इति आचार्यवाचस्पतिमिश्राः ॥ ९ ॥

नन्वीश्वरवज्जीवोऽपि वृत्तिमनपेक्ष्य स्वरूपचैतन्येनेव किमिति विषयान्नावभासयति ?—

बुद्धौ संसृज्यते जीवः सर्वगो व्यक्तिजातिवत् ।
अन्यैस्तद्वृत्यपारूढो ज्ञाता विवरणे स्थितः ॥ ६२ ॥

जैसे गोत्व आदि जातिके व्यापक होनेपर भी उसका गोव्यक्तिमें ही सम्बन्ध होता है, वैसे ही जीवके व्यापक होनेपर भी उसका अन्तःकरणमें ही सम्बन्ध होता है, और अन्तःकरणकी वृत्तिके ऊपर आरूढ़ होकर अन्य विषयोंके साथ उसका सम्बन्ध होता है, अतः वह (जीव) ज्ञाता होता है, ऐसा विवरणमें कहा गया है ॥६२॥

अत्रोक्तं विवरणे—ब्रह्मचैतन्यं सर्वोपादानतया सर्वतादात्म्यापन्नं सत् स्वसंसृष्टं सर्वमवभासयति, न जीवचैतन्यम् । तस्याऽविद्योपाधिकतया


इत्यादि ज्ञानजननकर्तृत्वकी (ज्ञानोत्पत्तिके प्रति कर्तृत्वकी) प्रतिपादक श्रुतिके साथ कोई भी विरोध नहीं है ॥ ९ ॥

शङ्का होती है कि ईश्वरकी नाईं जीव भी वृत्तिकी अपेक्षा न करके स्वरूपचैतन्यसे विषयोंका परिज्ञान (प्रकाश) क्यों नहीं करता है * ?

इसके ऊपर विवरणकारने यह समाधान किया है—ब्रह्मचैतन्य सभीका उपादान है, इसलिए सभीके साथ तादात्म्यरूप होकर स्वसम्बद्ध सब पदार्थोंका प्रकाश करता है, न कि जीवचैतन्य; कारण कि यद्यपि वह अविद्योपाधिक होनेसे


क्योंकि भाष्यकारने ही ईक्षत्यधिकरणमें सर्वविषयकज्ञानकर्तृत्व कहा है, इसलिए पूर्वपक्षमें कोई जीव नहीं है, इसी आशयसे श्रीवाचस्पतिमिश्रके पक्षका उपक्रम है। माया यद्यपि अनादि है, तथापि तत्तन् कार्योंके साथ मायाका तादात्म्य होनेसे मायावच्छिन्न चैतन्य कार्य हो सकता है, इसलिए 'दृष्टावच्छिन्नरूपेण तु घटाद्यकार्यत्वात्' इस ग्रन्थकी अनुपपत्ति नहीं है ।

* यदि वृत्तिकी अपेक्षा न करके जीव भी सब वस्तुओंका अवभासक हो, तो आपत्ति यह होगी कि अविद्याप्रतिबिम्बितचैतन्यरूप जीवके व्यापक होनेसे अपनेसे सम्बद्ध यावत् वस्तुका प्रकाशक होनेसे जीव भी सर्वज्ञ प्रसक्त होगा, अतः जीवको स्वरूपज्ञानसे अवभासक नहीं मानना चाहिए। और स्वरूपचैतन्यको किसी करणकी अपेक्षा न होनेसे चक्षु आदि व्यर्थ ही प्रसक्त होंगे।


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