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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 172 of 590

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Page 172
१४२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

( उ. मी. अ. १ पा. ४ सू. १९ ) इत्याधिकरणे विज्ञातृत्वं जीवलिङ्गमित्युक्तं भाष्यकारैः । 'यः सर्वज्ञः' इत्यादिश्रुतिरपि तस्य ज्ञानरूपत्वाभिप्रायेणैव योजनीयेति ।

दृश्यावच्छिन्नरूपेण चितः कार्यत्वसम्भवात् ।
सार्वज्ञ्यं ज्ञानकर्तृत्वं वाचस्पतिमते स्थितम् ॥ ६१ ॥

दृश्यावच्छिन्नरूपेण चैतन्य कार्यरूप हैं, अतः ज्ञानकर्तृत्व ही सर्वज्ञत्व है, ऐसा वाचस्पतिमिश्रका मत है ॥६१॥

यद्यपि ब्रह्म स्वरूपचैतन्येनैव स्वसंसृष्टसर्वावभासकम्, तथाऽपि तस्य स्वरूपेणाऽकार्यत्वेऽपि दृश्यावच्छिन्नरूपेण तु ब्रह्मकार्यत्वात् । 'यः सर्वज्ञः'

(सर्वज्ञत्व) ब्रह्ममें नहीं हैं अर्थात् ब्रह्म ज्ञाता नहीं है । इसीलिए 'वाक्यान्वयात् ※' इस अधिकरणमें भाष्यकारने विज्ञातृत्वका जीवके लिङ्गरूपसे कथन किया है । 'यः सर्वज्ञः' ( जो सर्वज्ञ ) इस श्रुतिकी भी ज्ञानरूपताके अभिप्रायसे ही योजना करनी चाहिए ।

† आचार्य वाचस्पतिमिश्र कहते हैं कि यद्यपि ब्रह्म अपनेसे सम्बद्ध सब वस्तुओंका अवभासक स्वरूपचैतन्यसे ही है, तथापि स्वरूपतः चैतन्यके उसके कार्य न होनेपर भी दृश्यावच्छिन्नरूपसे वह कार्य ही है, इससे 'यः सर्वज्ञः'


※ 'वाक्यान्वयात्', 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इत्यादि श्रुतिमें द्रष्टव्यरूपसे कहा गया आत्मा जीव नहीं है, किससे ? इससे कि 'इदं सर्वमात्मा' ( यह सब आत्मरूप है ) इत्यादि श्रुति-वाक्य तात्पर्यवृत्तिसे सर्वात्मक ब्रह्ममें ही अन्वित हैं । 'विज्ञातारम्' इत्यादि वाक्यके आधारपर पूर्वोक्त श्रुतिस्थ आत्मासे जीवात्माका ग्रहण नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उस वाक्यसे मुक्त पुरुषका ही बोधन होता है, अतः भूतपूर्वविज्ञातृत्व धर्मका, जो जीवमें ही था, अनुवादमात्र है, अतः द्रष्टव्य परमात्मा ही है, जीव नहीं । इसमें विज्ञातृत्व धर्म जीवलिङ्गतया ही उपन्यस्त है, ब्रह्मसाधारणविज्ञातृत्वका कथन नहीं है, अतः ब्रह्म स्वरूपतः सब वस्तुका प्रकाशक है, यह भाव है ।

† सब वेदान्तोंका लक्ष्य नित्य निर्विशेष चैतन्य ही है, अतः 'सर्वज्ञः' इसमें जो ज्ञाधातु .. है, उसका वाच्य यह नहीं हो सकता है, इसलिए उसका अर्थ विशिष्ट चेतन ही होगा, विशिष्ट चेतनके कार्य होनेसे 'सर्वज्ञः' में प्रत्ययार्थ जो कर्तृत्व है, उसकी उपपत्ति हो सकती है । ब्रह्ममें सर्वज्ञानकर्तृत्वप्रतिपादक श्रुति है, उसकी उपपत्ति होनेके लिए ज्ञातृत्व ईश्वरमें मानना होगा । जीवके लिङ्गरूपसे भाष्यकारने जो विज्ञातृत्वका कथन किया है, वह तो केवल वाक्यान्वयाधिकरणकी सिद्धान्तकोटिमें स्वीकृत निर्विशेष ब्रह्मसे व्यावृत्ति करनेके उद्देश्यसे है,