सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| १४४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
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सर्वगतत्वेऽप्यनुपादानत्वेनाऽसङ्गित्वात् । यथा सर्वगतं गोत्वसामान्यं स्वभावादश्वादिव्यक्तिसङ्गित्वाभावेऽपि सास्नावद्व्यक्तौ संसृज्यते, एवं विषयासङ्ग्यपि जीवः स्वभावादन्तःकरणे संसृज्यते । तथा च यदाऽन्तःकरणस्य परिणामो वृत्तिरूपो नयनादिद्वारेण निर्गत्य विषयपर्यन्तं चक्षूरश्मिवत् झटिति दीर्घप्रभाकारेण परिणम्य विषयं व्याप्नोति, तदा तमुपारुह्य तं विषयं गोचरयति । केवलाग्न्यदाह्यस्याऽपि तृणादेरयःपिण्डसमारूढाग्निदाह्यत्ववत् केवलजीवचैतन्याप्रकाशयस्याऽपि घटादेरन्तःकरणवृत्त्युपारूढस्य तत्प्रकाशयत्वं युक्तम् ।
यद्वाऽन्तःकरणोपाधिर्जीवो वृत्त्या बहिर्गतः ।
विषयब्रह्मचैतन्याभेदव्यक्त्याऽर्थभासकः ॥ ६३ ॥
अथवा अन्तःकरणोपाधिक जीव वृत्तिद्वारा बाहर निकलकर विषयचैतन्य और ब्रह्मचैतन्यकी अभेदाभिव्यक्तिसे अर्थका अवभासक होता है ॥६३॥
यद्वाऽन्तःकरणोपाधिकत्वेन जीवः परिच्छिन्नः । अतः संसर्गाभावान्न
सर्वगत है, तो भी विषयोंके प्रति अनुपादान होनेसे घट आदिके साथ उसका सम्बन्ध नहीं है। जैसे गोत्व जाति व्यापक है, तथापि उसका स्वभावसे अश्व आदि व्यक्तिके साथ सम्बन्ध नहीं है, परन्तु सास्त्रावाली गो व्यक्तिमें ही उसका सम्बन्ध है, वैसे ही जीवके विषयासङ्गी होनेपर भी वह स्वभावतः अन्तःकरणके साथ संसृष्ट होता है। इस रीतिसे जीवका स्वभावतः विषयके साथ सम्बन्ध न होनेपर जब नेत्र आदि द्वारसे अन्तःकरणका वृत्तिरूप परिणाम विषयदेश तक निकलकर चक्षुकी रश्मिके समान सहसा बड़ी प्रभाके आकारसे परिणत होकर विषयको व्याप्त करता है, तब जीवचैतन्य उस परिणामके ऊपर चढ़कर उस विषयको प्रकाशित करता है। जैसे तृण आदिका केवल शुद्ध अग्निसे दाह नहीं होता है, परन्तु अयोगोलक आदिके ऊपर आरूढ़ होकर तृण आदिको अग्नि दग्ध करती है, वैसे ही केवल जीवचैतन्यसे विषयका प्रकाश न होनेपर भी वृत्तिके ऊपर आरूढ़ होकर जीवचैतन्य विषयका प्रकाश करता है, यह मानना युक्त है।
अथवा जीव अन्तःकरणोपाधिक चैतन्य है, अतः वह परिच्छिन्न है। इसलिए विषयके साथ उसका सम्बन्ध न होनेसे घट आदिका प्रकाश नहीं