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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 168 of 590

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Page 168
१३८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

तत्र सर्वार्थविषयसर्वधीवासनोपधः ।
साक्षित्वाद्भारतीतीर्थमते सार्वज्ञ्यमीरितम् ॥ ५७ ॥

सम्पूर्णवस्तुविषयक सम्पूर्णधीवासनाओंसे उपहित ईश्वर सम्पूर्ण विषयवासनाका साक्षी है, अतः ईश्वरमें सर्वज्ञत्व है, ऐसा भारतीतीर्थका मत कहा गया है ॥५७॥

अत्र सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपरक्ताज्ञानोपाधिक ईश्वरः । अतस्तस्य सर्वविषयवासनासाक्षितया सर्वज्ञत्वमिति भारतीतीर्थादिपक्षः प्रागेव दर्शितः ।

चिच्छायाग्राहिभिर्मायावृत्तिभेदैस्तदीशितुः ।
त्रैकालिकेष्वपरोक्ष्यं प्रकटार्थकृतो विदुः ॥ ५८ ॥

चित्प्रतिबिम्बका ग्रहण करनेवाली मायावृत्तियोंसे ईश्वरसे कालत्रयमें रहनेवाले प्रपञ्चका जो अपरोक्ष ज्ञान है, वह सर्वज्ञत्व है, ऐसा प्रकटार्थकार कहते हैं ॥५८॥

प्रकटार्थकारास्त्नाडुः—यथा जीवस्य स्वोपाध्यन्तःकरणपरिणामाश्चैतन्यप्रतिबिम्बग्राहिण इति तद्योगात् ज्ञातृत्वम्, एवं ब्रह्मणः स्वोपाधिमाया-


* इस आक्षेपके समाधानमें भारतीतीर्थ आदिका पक्ष पूर्वमें ही दिखलाया गया है कि सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्णप्राणिधीवासनाओंसे उपरक्त अज्ञानसे उपहित † चैतन्य ईश्वर है, इससे अपनी उपाधिभूत वासनाओंके विषयीभूत वस्तुओंके अवभासकरूपसे ईश्वरमें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति हो सकती है ।

प्रकटार्थकार कहते हैं कि ‡ जैसे जीवके उपाधिरूप अन्तःकरणके परिणाम (वृत्तियाँ) चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण करते हैं, इसलिए उनके योगसे जीव ज्ञाता होता है, वैसे ही ब्रह्मकी उपाधिभूत मायाके परिणाम चैतन्यके


ज्ञातृत्वकी निवृत्तिसे व्याप्य सर्वज्ञत्वका भी निरास हुआ, कारण कि व्यापकके अभावसे व्याप्यका अभाव सिद्ध होता है, यह सिद्धान्त है, अतः पूर्वपक्ष होता है कि ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वकी उपपत्ति कैसे हो सकती है ।

* ‘सर्ववस्तुविषयसकलप्राणिधीवासनोपाधिकस्य तस्य सर्वज्ञत्वस्य तत एवोपपत्तेः’ इस ग्रन्थसे दिखलाया गया है [ द्रष्टव्य—पृ० ९४ ] ।

† जैसे प्रकटार्थकारके मतसे जीवमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि अन्तःकरण है, वैसे ही ईश्वरमें ज्ञातृत्वकी प्रयोजक उपाधि माया है, इसलिए मायोपाधिक ब्रह्ममें सर्वज्ञत्वका व्यापक ज्ञातृत्व नहीं है, ऐसा नहीं है, परन्तु है ही और ‘मायिनन्तु महेश्वरम्’ इत्यादि श्रुतिसे माया ईश्वरकी उपाधि प्रसिद्ध है ।

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