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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 169 of 590

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Page 169

ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार] भाषानुवादसहित १३९


परिणामाश्रितप्रतिबिम्बग्राहिणस्सन्तीति तत्प्रतिबिम्बितैः स्फुरणैः कालत्रयवर्तिनोऽपि प्रपञ्चस्याऽपरोक्षेणाऽवकलनात् सर्वज्ञत्वमिति ।

तत्त्वशुद्धिकृतो भूते स्मृतिं भाविनि तूहनम् ॥

ब्रह्ममें [ वर्तमान वस्तुका अनुभव है ], भूतकालीन वस्तुका स्मरण है और भविष्यत्कालीन वस्तुका भी ( मूलोक्त प्रकारसे ) ज्ञान है, इसलिए ब्रह्म सर्वदा सर्वज्ञ है, ऐसा तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं ।

तत्त्वशुद्धिकारास्तूक्तरीत्या ब्रह्मणो विद्यमाननिखिलप्रपञ्चसाक्षात्कारसम्भवात् तज्जनितसंस्कारवत्तया च स्मरणोपपत्तेरतीतसकलवस्त्ववभाससिद्धिः । सृष्टेः प्राङ् मायायाः सृज्यमाननिखिलपदार्थस्फुरणरूपेण जीवादृष्टानुरोधेन विवर्तमानत्वात् तत्साक्षितया तदुपाधिकस्य ब्रह्मणोऽपि तत्साधकत्वसिद्धेः अनागतवस्तुविषयविज्ञानोपपत्तिरिति सर्वज्ञत्वं समर्थयन्ते ।

सदा सर्वस्य सत्त्वात्तु साक्षिणा कौमुदीकृतः ॥ ५९ ॥
सार्वज्ञ्ये ज्ञानरूपत्वमिष्टं न ज्ञानकर्तृता ।


प्रतिबिम्बको ग्रहण करनेवाले हैं, अतः उनमें प्रतिबिम्बित स्फुरण ( चैतन्य ) तीनों कालमें रहनेवाले प्रपञ्चको अपरोक्षसे विषय करते हैं, अतः ब्रह्ममें सर्वज्ञत्व हो सकता है ।

! तत्त्वशुद्धिकार कहते हैं कि पूर्वोक्त रीतिसे सम्पूर्ण वर्तमान प्रपञ्चका साक्षात्कार सम्भव है और विद्यमान वस्तुविषयक साक्षात्कारसे उत्पन्न संस्कारके आश्रयरूपसे भूतकालीन सम्पूर्ण वस्तुके अवभासकी सिद्धि होती है । सृष्टिके पूर्वकालमें जीवोंके अदृष्टवशसे सृज्यमान सम्पूर्ण पदार्थोंकी वृत्तिरूपसे मायाका परिणाम होता है, इससे मायामें प्रतिबिम्ब होनेसे मायोपाधिक ब्रह्ममें भी मायाकी वृत्तिके प्रति कर्तृत्वकी सिद्धि होनेसे अनागतवस्तुविषयक विज्ञानकी उपपत्ति है, अतः ब्रह्मके सर्वज्ञत्वकी सिद्धि है ।


‡ इस तत्त्वशुद्धिकारके मतमें पूर्वमतसे यह विशेष है—पूर्वोक्तमतमें ईश्वरका अतीत-अनागत-विषयक ज्ञान अपरोक्ष ही है और इस मतमें जीवके समान ईश्वरका भी अतीत आदिविषयक ज्ञान परोक्ष है, क्योंकि लोकमें वर्तमानविषयक ज्ञान ही अपरोक्ष ज्ञान कहा जाता है । अवर्तमान-विषयक अपरोक्ष ज्ञान नहीं कहा जाता, अतः लोकमें अनुभूत स्वभावका शास्त्र भी अतिक्रमण नहीं कर सकता है ।