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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 167 of 590

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Page 167

ब्रह्मकी सर्वज्ञताका स्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित १३७


जगत्कर्तृत्वसंसिद्धं सर्वज्ञत्वं समर्थितम् ।
ईशस्य शास्त्रयोनित्वात्तच्च कीदृग्विधं भवेत् ॥ ५६ ॥

ईश्वर जगत्का कर्ता है, इससे अर्थतः और सम्पूर्ण वेदोंका कर्ता है, इससे साक्षात् ईश्वरमें सर्वज्ञत्व सिद्ध है, वह सर्वज्ञत्व कैसा है ? ॥५६॥

अनेनैव निखिलप्रपञ्चरचनाकर्तृभावेनाऽर्थसिद्धं सर्वज्ञत्वं ब्रह्मणः 'शास्त्रयोनित्वात्' ( उ. मी. अ. १ पा. १ सू. ३ ) इत्यधिकरणे वेदकर्तृत्वेनाऽपि समर्थितम् ॥८॥

अथ कथं ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वं सङ्गच्छते । जीववदन्तःकरणाभावेन ज्ञातृत्वस्यैवाऽयोगात् ।


इसी सम्पूर्ण प्रपञ्चरचनाके कर्तृत्वसे ब्रह्ममें अर्थतः सिद्ध हुए सर्वज्ञत्वका 'शास्त्रयोनित्वात्' इस अधिकरणमें वेदकर्तृत्वसे भी समर्थन किया गया है * ॥ ८ ॥

अब शङ्का करते हैं कि ब्रह्म सर्वज्ञ कैसे हो सकता है ? क्योंकि जीवके समान ब्रह्ममें अन्तःकरणका सम्बन्ध न होनेसे ज्ञातृत्वका ही असम्भव है † ।


* 'जन्माद्यस्य यतः' ( जिस आनन्दकन्दसे समस्त प्रपञ्चकी उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय होते हैं, वह ब्रह्म है ) इस सूत्रसे समस्त प्रपञ्चका कर्ता होकर जगत्का जो उपादान हो, वह ब्रह्म है, ऐसा लक्षण प्राप्त होता है, परन्तु सर्वज्ञत्वके बिना सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलयके प्रति कर्तृत्व ब्रह्ममें नहीं हो सकता है, अतः ब्रह्मका सर्वज्ञत्व अर्थतः सिद्ध है । और 'शास्त्रयोनित्वात्' ( ब्रह्म सर्वज्ञ है, क्योंकि ऋग्वेद-आदि साङ्ग समस्त वेदोंका कर्ता है ) इस अधिकरणमें वेदकर्तृत्वसे भी सर्वज्ञताका साक्षात् साधन किया गया है, पूर्वके 'जन्माद्यस्य यतः' इस सूत्रमें अर्थतः सिद्ध है और 'शास्त्रयोनित्वात्' में साक्षात् सर्वज्ञत्वका साधन है, क्योंकि पूर्वसूत्र ब्रह्मका लक्षण बोधन करता है 'और शास्त्रयोनित्वात्' सर्वज्ञत्वका साधन करता है ।

† यद्यपि 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' इत्यादि श्रुतियोंसे ब्रह्मके सर्वज्ञत्वका साक्षात् ही कथन है, तथापि युक्तियोंसे सर्वज्ञत्वका अधिक दृढीकरण करनेके लिए इस सर्वज्ञत्वविचारका उपक्रम है । शङ्का करनेवालेका भाव यह है कि जीवमें ज्ञातृत्वका व्यवहार जो होता है, वह अन्तःकरणरूप जीवकी उपाधिके आधारपर ही अवलम्बित है, ईश्वरके अन्तःकरण नहीं है, अतः उसमें ज्ञातृत्वका सर्वथा अभाव ही रहेगा, ईश्वरकी उपाधि अन्तःकरण नहीं हो सकता, क्योंकि 'कार्योपाधिरयं जीवः' इस उदाहृत श्रुतिसे अन्तःकरण जीवकी ही उपाधि कही गई है। ज्ञातृत्व धर्म सर्वज्ञत्वका व्यापक है, अर्थात् जहाँ जहाँ सर्वज्ञत्व होगा वहाँ वहाँ ज्ञातृत्व अवश्य रहेगा, क्योंकि ज्ञातृत्वका एकदेश ही सर्वज्ञत्व है । इसलिए व्यापक

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