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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 166 of 590

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Page 166
१३६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ प्रथम परिच्छेद

जीवस्य कर्तृत्वप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः, 'अथ रथान् रथयोगान् पथः सृजते स हि कर्ता' इत्यादिश्रुत्यैव जीवस्य स्वप्नप्रपञ्चकर्तृत्वोक्तेरिति वाच्यम् । भाष्यकारैः 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहतीतिवत् कर्तृत्वोपचारमात्रं रथादिप्रतिभाननिमित्तत्वेन' इति व्याख्यातत्वादित्याहुः ॥


कर्ता नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें भी शुक्ति-रजत और स्वप्नविभ्रमके प्रति कर्तृत्वका प्रसङ्ग होगा, क्योंकि उसमें अध्यस्यमान (जिनका अध्यास होता है, ऐसे) रजत आदिके अनुकूल जो अधिष्ठानका ज्ञान है, वह है । परन्तु यह दोष नहीं है, प्रत्युत इष्टापत्ति ही है, क्योंकि 'अथ रथान्०' (स्वप्न-कालमें जीव रथ, घोड़े और मार्गको उत्पन्न करता है, क्योंकि वह जीव स्वाप्न पदार्थके हेतुभूत कर्मका कर्ता है) इस श्रुतिसे 'जीव स्वाप्न प्रपञ्चका कर्ता है' ऐसा कहा गया है, नहीं इष्टापत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि भाष्यकारने व्याख्यान किया है कि जैसे 'लाङ्गल गो आदिका उद्वहन करता है' यह प्रयोग केवल औपचारिक है, वैसे ही रथ आदिके प्रतिभानके निमित्तरूपसे जीवमें कर्तृत्वका उपचारमात्र * है।


* 'लाङ्गलं गवादीनुद्वहति' (हल गाय आदि पशुओंका उद्वहन करता है अर्थात् गौ आदि पशुओंकी जीवनस्थितिको हल करता है) इस प्रयोगमें लाङ्गलमें गाय आदिका स्थितिकर्तृत्वरूप उद्बोढ़त्व सुना जाता है, वह मुख्य नहीं हो सकता है, क्योंकि हलका भक्षण नहीं किया जा सकता है। पशुओंका उद्वहन करना कैसे हो सकता है, इसलिए—लाङ्गलसे कृषि होगी, कृषिसे गाय आदिकी स्थितिमें कारणभूत भूसा आदिका लाभ होगा—इस प्रकार परम्परासे औपचारिक कहा जाता है, वैसे ही स्वप्नरथ आदिका जो प्रतिभान—प्रतिभास होता है उसमें कारणभूत धर्म आदिके, कर्ता होनेसे 'स हि कर्ता' इत्यादि श्रुतिमें जीवोंमें स्वप्नरथ आदिके प्रति कर्तृता कही गई है, वस्तुतः नहीं। इस प्रकार भाष्यकारने जीवमें औपचारिक कर्तृत्व—स्वप्नरथ आदिके प्रति कहा है, विवरणमें सुख आदिके प्रति जीवमें जो कर्तृत्वका प्रतिपादन किया गया है, वह भी इससे औपचारिक ही साबित होता है। 'मया इदं स्रष्टव्यम्' (मुझे यह बनाना चाहिए) इस प्रकार आत्माके आलोचनात्मक ज्ञानके न रहनेपर भी सुख आदि देखे जाते हैं, अतः मुख्य कर्तृत्वकी सम्भावना नहीं है 'वीक्षणमात्रासाध्यम्' इस प्रकार जो कल्पतरुका वचन है, इससे भी सृष्ट्यालोचनरूप ज्ञान ही वीक्षणशब्दसे अभिप्रेत है, अतः उसके साथ भी कोई विरोध नहीं है, यह भाव है।

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