Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 131 of 590

Read in context
Page 131
जीवईश्वरस्वरूपविचार ]भाषानुवादसहित

दृग्दृश्यविवेके तु चित्रदीपव्युत्पादितं कूटस्थं जीवकोटावन्तर्भाव्य चित्रैविध्यप्रक्रियैवाऽऽलम्बितेति विशेषः ।

तत्र ह्युक्तं जलाशयतरङ्गबुद्बुदन्यायेनोपर्युपरि कल्पनाद् जीवः त्रिविधः— पारमार्थिकः, व्यावहारिकः, प्रातिभासिकश्चेति । तत्राऽवच्छिन्नः पारमार्थिकः

विद्यारण्यस्वामीजीने दृग्दृश्यविवेकमें तो—चित्रदीपप्रकरणमें व्युत्पादित कूटस्थका जीवकोटिमें अन्तर्भाव करके—चैतन्यकी त्रिविधप्रक्रियाका ही अवलम्बन किया है, यह विशेष है ।

दृग्दृश्यविवेकमें जलाशयके तरङ्ग और बुद्बुदके दृष्टान्तसे * ऊपर ऊपरकी कल्पनासे जीवके तीन भेद कहे गये हैं—पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक । तीन जीवोंमें से अवच्छिन्न अर्थात् स्थूल और सूक्ष्म दो शरीरोंसे अवच्छिन्न कूटस्थ आत्मा—पारमार्थिक जीव है । उस अवच्छिन्न जीवमें


अर्थात् बुद्धिकी मन्दतासे अथवा सामग्रीके अभावसे जो विचार नहीं कर सकता, वह प्रतिदिन ब्रह्मकी उपासना करे, यह भाव है । अतः मूलमें भी 'प्रतिपत्तिसौकर्याय' यही कहा गया है यह ध्यान रखना चाहिए ।

* जलाशय, तरङ्ग और बुद्बुदके दृष्टान्तका सारांश यह है—जैसे समुद्र आदि जलाशयमें तरङ्ग ऊपर रहती हैं और उनके ऊपर बुद्बुद रहते हैं, यह प्रसिद्ध है, इसी प्रकार कूटस्थके ऊपर व्यावहारिक अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप सम्पूर्ण व्यवहारकालमें अनुगत व्यावहारिक जीवकी कल्पना की जाती है और उसके ऊपर स्वप्नकालमें वासनामय प्रातिभासिक रथ आदिके समान वासनामय अन्तःकरणमें प्रतिबिम्बरूप प्रातिभासिक जीवकी कल्पना की जाती है । इस विषयमें दृग्दृश्यविवेकके निम्न लिखित श्लोक हैं, जिनका भाव भी मूल ग्रन्थके अनुसार ही है—

'अवच्छिन्नः चिदाभासस्तृतीयः स्वप्नकल्पितः ।
विज्ञेयस्त्रिविधो जीवस्तत्राद्यः पारमार्थिकः ॥३२॥
अवच्छेदः कल्पितः स्यात् अवच्छेद्यन्तु वास्तवम् ।
तस्मिन् जीवत्वमारोपात् ब्रह्मत्वन्तु स्वभावतः ॥३३॥
अवच्छिन्नस्य जीवस्य पूर्णेन ब्रह्मणैकताम् ।
तत्त्वमस्यादिवाक्यानि जगुर्नितरजीवयोः ॥३४॥
ब्रह्मण्यवस्थिता माया विक्षेपशक्तिरूपिणी ।
आवृत्याखण्डतां तस्मिन् जगज्जीवौ प्रकल्पयेत् ॥३५॥
जीवो धीस्थचिदाभासो जगत् स्यात् भूतभौतिकम् ।
अनादिकालमारभ्य मोक्षात् पूर्वमिदं द्वयम् ॥३६॥'

[email protected]