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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 130 of 590

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Page 130

:१०.० सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद

म्यात् विराडादीन् विश्वादिष्वन्तर्भाव्य 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः' इत्यादिना विश्वादिपादान् न्यरूपयत् । अतः प्राज्ञशब्दिते आनन्दमये अव्याकृतस्येश्वरस्याऽन्तर्भावं विवक्षित्वा तस्य सर्वेश्वरत्वादितद्धर्मवचनमिति । इत्थमेव भगवत्पादैर्गौडपादीयविवरणे व्याख्यातम् ।

मायाच्छन्ने चिदाभासः कूटस्थे व्यावहारिकः ॥
तस्मिन्निद्रावृते तादृक् जीवोऽन्यः प्रातिभासिकः ३८ ॥
जीवस्त्रिधैवं दृग्दृश्यविवेके प्रतिपादितः ॥
इत्येते दर्शिताः पक्षाः प्रतिबिम्बेशवादिनाम् ॥ ३९ ॥

अन्तःकरणावच्छिन्न कूटस्थ चैतन्य पारमार्थिक जीव है, मायावृत कूटस्थमें (मायामें कल्पित अन्तःकरणमें ) जो चित्‌का आभास है, वह व्यावहारिक जीव है और निद्रासे आवृत व्यावहारिक जीवमें कल्पित चिदाभास प्रातिभासिक है, इस प्रकार त्रिविध जीव का दृग्दृश्यविवेकमें प्रतिपादन किया गया है, इस रीतिसे ईश्वरको प्रतिबिम्बरूप माननेवालोंके पक्ष दिखलाये गये हैं ॥३८॥३९॥

स्थूल, सूक्ष्म और सूक्ष्मतर उपाधिकी समानतासे विराड् आदिका विश्व आदिमें अन्तर्भाव करके 'जागरितस्थानो बहिःप्रज्ञः' (जाग्रदवस्थाका अभिमानी बहिःप्रज्ञ है) इत्यादिसे विश्व आदि पादोंका निरूपण किया है। इससे प्राज्ञशब्दसे कहे जानेवाले आनन्दमयमें अव्याकृत * ईश्वरके अन्तर्भावकी विवक्षाकरके उसमें (आनन्दमयमें) सर्वेश्वरत्व आदि ईश्वरके धर्मोंका कथन है। भगवान् शङ्करने गौड़पादीय-विवरणमें भी ऐसा ही व्याख्यान किया है।


* यद्यपि अव्याकृत शब्दका अर्थ है—अनभिव्यक्त जगत्, तथापि लक्षणावृत्तिसे अनेक स्थलोंमें वह ईश्वरार्थक भी प्रसिद्ध है, अतः यहाँ अव्याकृतशब्द ईश्वरके अर्थमें आया है । इस ग्रन्थमें विश्व आदि पादोंका पूर्व-पूर्वमें प्रविलापन करनेसे निष्प्रपञ्च ब्रह्मका ज्ञान अत्यन्त सुलभ कहा गया है । यद्यपि श्रवण आदि अन्य ब्रह्मज्ञानके साधन हैं, तो भी मन्दबुद्धिवाले संन्यासीको अथवा प्रखर-बुद्धिमान् होते हुए भी जिसको न्याय-व्युत्पादक कुशल आचार्य नहीं मिला है, ऐसे संन्यासीको साङ्ख्यमार्ग द्वारा तत्त्वप्रतिपत्ति नहीं हो सकती है, इसलिए उक्त पुरुषोंको अनायास ब्रह्मज्ञानके साधनरूपसे बुद्धिपूर्वक प्रविलापन क्रमसे माण्डूक्य आदि ग्रन्थमें समाधिका विधान है, इसीलिए ध्यानदीपमें विद्यारण्यस्वामीजीने भी कहा है—
'अत्यन्तबुद्धिमान्द्याद्वा सामग्र्या वाप्यसम्भवात् ।
यो विचारं न लभते ब्रह्मोपासीत सोऽनिशम् ॥' ५४ ध्या० दीप ॥

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