Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 122 of 590

Read in context
Page 122

९२ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ प्रथम परिच्छेद


इति पुरुषत्वबोधेन स्थाणुत्वबुद्धिर्निवर्त्यते । एवम् 'अहं ब्रह्मास्मि' इति कूटस्थब्रह्मस्वरूपत्वबोधेनाऽध्यस्ताहमर्थरूपत्वं निवर्त्यते ।

'योऽयं स्थाणुः पुमानेष पुन्धिया स्थाणुधीरिव ।
ब्रह्माऽस्मीति धियाऽशेषा ह्यहम्बुद्धिर्निवर्त्तते ॥'

इति नैष्कर्म्यसिद्धिवचनात् । यदि च विवरणाद्युक्तरीत्या दृढ़मभेदे सामानाधिकरण्यम्, तदा जीववाचिनोऽहंशब्दस्य लक्षणया कूटस्थपरत्व-मस्तु । तस्याऽनध्यस्तस्य ब्रह्माभेदे योग्यत्वात् ।


'जो स्थाणु है, वह पुरुष है, इस प्रकार स्थाणुमें पुरुषत्वके ‡ बोधनसे स्थाणु-त्वका ज्ञान निवृत्त होता है, वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूं' इस प्रकार जीवमें ब्रह्मस्वरूपत्वके बोधसे अध्यस्त अहमर्थरूपताकी—जीवरूपताकी—निवृत्ति होती है ।

'योऽयं स्थाणुः०' ( जैसे मन्द अन्धकारमें 'जिसे स्थाणु [ पुरुषाकार खड़ा हुआ सूखा वृक्ष विशेष ] समझा था यह तो पुरुष है, इस प्रकारके महाजनके वाक्यसे उत्पन्न हुई पुरुषविषयक बुद्धिसे अर्थात् 'यह पुरुष ही है स्थाणु नहीं' इस प्रकारकी बुद्धिसे 'यह स्थाणु है' इस प्रकारकी बुद्धि आरोपित स्थाणु तादात्म्य के साथ निवृत्त होती है, वैसे ही 'मैं ब्रह्म हूँ' इस वाक्यसे उत्पन्न बुद्धिसे—अहमर्थभूत जीवके तादात्म्यसे शून्य केवल ब्रह्मरूप ही मैं हूँ, इस प्रकारकी अहंबुद्धिसे—'मैं करता हूँ' इत्यादि सम्पूर्ण बुद्धि आरोपित अहमर्थके साथ निवृत्त होती है ) ऐसा नैष्कर्म्यसिद्धिका ※ वचन भी है । यदि विवरण आदिके कथना-नुसार 'अहं ब्रह्मास्मि' ( मैं ब्रह्म हूँ ) यह सामानाधिकरण्य अभेदमें माना जाय, तो जीववाचक अहंशब्दका लक्षणावृत्तिसे कूटस्थ चैतन्य ही अर्थ मानना होगा, क्योंकि उसीकी अनध्यस्त ब्रह्मके अभेदमें योग्यता है ।


‡ पुरुषत्वपदसे कल्पितस्थाणुतादात्म्याभाववत्त्व विवक्षित है, क्योंकि बाधक ही वाक्यार्थ माना गया है, यह भाव है ।
※ नैष्कर्म्यसिद्धिमें सुरेश्वराचार्यका यह वचन है, इसलिए बाधको वाक्यार्थ माननेमें कोई हानि नहीं है। इस श्लोकमें 'हि' शब्द इस अर्थका सूचन करता है—महावाक्यार्थके ठीक-ठीक परिज्ञानसे सम्पूर्ण अनर्थकी निवृत्ति होती है, यह अनुभवी पुरुषोंके अनुभवसे सिद्ध है ।
† समानाधिकरण वाक्योंका यह स्वभाव है कि उनका अर्थ मुख्यतः अभेद ही होता है, और विवरण आदिमें ऐसे समानाधिकरण वाक्योंकी अभेदार्थकता ही मानी गई है । वाक्यवृत्तिमें भगवत्पादशङ्कराचार्यजी महाराजने भी 'तादात्म्यमात्रं वाक्यार्थस्तयोरेव पदार्थयोः' इस श्लोकसे