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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 121 of 590

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Page 121

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९१


पादनेन, 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा' इति कूटस्थाभिप्रायेणाऽविनाशप्रतिपादनेन च स्पष्टः । अहमर्थस्य जीवस्य विनाशित्वे कथमविनाशिब्रह्माभेदः । नेदमभेदे सामानाधिकरण्यम् , किन्तु बाधायाम् । यथा 'यः स्थाणुरेष पुमान्'

किया गया है, इससे और 'अविनाशी वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! यह आत्मा अविनाशी है) इत्यादि श्रुतिसे कूटस्थ आत्माके अविनाशित्वका प्रतिपादन करनेसे स्पष्ट ही है *। यहांपर शङ्का होती है कि यदि श्रुतिसे वह विनाशी सिद्ध हो तो उसका—अहमर्थ जीवका—अविनाशी ब्रह्मके साथ अभेद कैसे होगा ? यह शङ्का युक्त नहीं है, क्योंकि अविनाशी ब्रह्म और जीवका सामानाधिकरण्य अभेद अर्थमें नहीं है, † परन्तु बाध अर्थमें सामानाधिकरण्य है—जैसे


* भाव यह है कि यद्यपि 'अयमात्मा प्रज्ञानघनः' इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है कि चिदेकरस आत्मा ही उपाधिके उद्भवके पश्चात् उत्पन्न होता है और उपाधिके नाशके अनन्तर नष्ट होता है, अतः उपाधिकी उत्पत्ति और विनाशसे पृथक् ही चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाशका प्रतिपादन है, क्योंकि अनुशव्दका प्रयोग है, तथापि चिदात्माकी उत्पत्ति और विनाश स्वभावसिद्ध है, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि 'अविनाशी वा अरेऽयमात्मा०' ( हे मैत्रेयि, यह आत्मा अविनाशी है) इस श्रुतिसे विज्ञानघन आत्माके अविनाशका प्रतिपादन है। इसलिए उत्पत्ति-विनाशवान् चैतन्य प्रतिबिम्बरूप जीवके तादात्म्यके आधारपर विनाश आदि वचनकी उपपत्ति करनी चाहिए। इससे भ्रमस्थलमें रजत और इदमर्थमें जैसे विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निश्चयसे भेदम्रह होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी विनाशित्व और अविनाशित्वरूप विरुद्ध धर्मके निश्चयसे ही जीव और कूटस्थके भेदका परिज्ञान होता है।

† इसका यह भाव है 'सोऽयम् नरेन्द्रः' (वह यह नरेन्द्र है) इत्यादि समानाधिकरण वाक्यका जैसे अभेद अर्थ प्रतीत होता है—कलकत्तेमें जिस नरेन्द्रको देखा था वही यह है, अतः कलकत्तेके नरेन्द्र और इस नरेन्द्रका भेद नहीं है किन्तु अभेद ही है, वैसे 'यः स्थाणुः स पुरुषः' ( जो स्थाणु था वह पुरुष है ) इस समानाधिकरण वाक्यसे अभेद—प्रतीत नहीं होता, क्योंकि स्थाणु और पुरुषका अभेद कभी नहीं घट सकता, इसलिए यहाँपर वाच्यार्थ है—बाध, अर्थात् उक्त वाक्यसे—जिस आधारभूत पुरुषमें स्थाणुत्वकी कल्पना की गई है, उसमें स्थाणुतादात्म्य नहीं है—इस प्रकार बाधरूप वाक्यार्थ देखा जाता है। इसलिए 'यः स्थाणुः स पुरुषः' इस वाक्यसे 'वस्तुतः स्थाणुतादात्म्याभाववानयं पुरुषः' ( वस्तुतः पुरुष स्थाणु-तादात्म्यका आधार नहीं है ) यह बोध होता है। इस बोधसे पुरुषमें स्थाणुरूप निश्चयके सहित आरोप निवृत्त होता है। इसी रीतिसे 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) अहमर्थ (जीव) तादात्म्यसे शून्य 'मैं ब्रह्म हूँ' यह ज्ञान होता है और इस ज्ञानसे 'मैं कर्त्ता हूँ' इत्यादि आरोप—सम्पूर्ण कर्तृत्व आदि धर्मोंसे विशिष्ट जीवरूप अपने विषयोंके साथ निवृत्त होता है। आरोपित अहमर्थकी निवृत्ति होनेपर जो जीवका कूटस्थसत्यस्वरूप स्वरूप है वह पूर्ण ब्रह्मरूपसे रहता है, इसलिए श्रुत्यन्तरके साथ विरोध नहीं है ॥

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