Skip to content
SarvaKosh
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished590 pages

Page 123 of 590

Read in context
Page 123

जीवेश्वरस्वरूपविचार ] भाषानुवादसहित ९३


यस्तु मेघाकाशतुल्यो धीवासनाप्रतिविम्ब ईश्वर उक्तः, सोऽयं 'सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक्' इति माण्डूक्यश्रुतिसिद्धः सौषुप्तानन्दमयः, तत्रैव तदनन्तरम् 'एष सर्वेश्वर एष सर्वज्ञ एषोऽन्तर्याम्येष योनिः सर्वस्य प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम्' इति श्रुतेः ।


* और मेघाकाशके समान धीवासनाओंमें प्रतिबिम्ब चैतन्य ईश्वर है, ऐसा जो कहा गया है, वह 'सुषुप्तस्थान एकीभूतः' ( सुषुप्तस्थान—सुषुप्त है स्थान जिसका, ऐसा एकीभूत और प्रज्ञानघन—जीव ही आनन्दमय और आनन्दभोक्ता है ) इस माण्डूक्यश्रुतिसे सिद्ध सुषुप्तिकालीन आनन्दमय है, क्योंकि वहींपर उसके बाद 'एष सर्वेश्वरः०' ( यही सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और


'तत्त्वमसि' महावाक्यमें तत् और त्वंकः तादात्म्यशब्दसे कहे जानेवाला अभेद ही वाक्यार्थ माना है, इसलिए वार्तिककारके वचनानुसार 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादि स्थलमें वाक्यका वाक्यार्थकत्व केवल प्रौढिवाद ही है, इसलिए 'अहं ब्रह्मास्मि' इत्यादिमें अभेदको ही वाक्यार्थ मानना चाहिए । इस परिस्थितिमें विनाशी जीव और अविनाशी ब्रह्मका अभेद नहीं हो सकता है, इसलिए पूर्वमतमें अस्वरस है, अतः 'यदि च' शब्दसे विवरणका मत कहते हैं ।

* यहाँ तुशब्द अवधारणार्थक है अर्थात् पूर्वमें जो ईश्वर कहा गया है, वह श्रुतिमें उक्त आनन्दमय ही है, उससे अन्य नहीं है, यह भाव है । 'सुषुप्तस्थान' इत्यादि श्रुतिका स्पष्ट अर्थ यह है—सुषुप्तं स्थानं यस्य सः—सुषुप्तस्थानः अर्थात् जिसका सुषुप्ति स्थान है । जाग्रदवस्थामें अन्तःकरणके साथ तादात्म्यका अध्यास होनेसे विज्ञानमयत्व, मनोमयत्व और मन्तृत्व आदि रूप जीवके धर्म हैं, देहमें 'मैं स्थूल हूँ' इत्यादि अध्याससे स्थूलत्व, कृशत्व, ब्राह्मणत्व आदि रूप धर्म हैं, तथा चक्षु आदिमें 'मैं काना हूँ' इत्यादिके अध्याससे काणत्व आदि धर्म हैं, इसी प्रकार आकाश आदि बाह्य पदार्थोंमें अध्याससे होनेवाले श्रुतिद्वारा प्रतिपादित आकाशगत्व आदि धर्म हैं और सुषुप्तिमें तो बुद्धि आदिका विलय होनेसे समस्त संसारकी भ्रान्तिका अभाव होनेसे उक्त सभी प्रकारके स्वरूप लीन होते हैं, अतः इसी अभिप्रायसे श्रुतिमें एकीभूत कहा गया है, इसीसे इस अर्थका संग्राहक श्लोक उपलब्ध होता है—

'विज्ञानमयमुख्यैर्यो रूपैर्युक्तः पुराऽधुना ।
स लयेनैकतां प्राप्तो बहुत्तण्डुलपिष्टवत् ॥' [ प० ब्रह्मानन्द श्लो० ६९ ]

सुषुप्तिके पूर्वमें विज्ञानमय आदि स्वरूपोंसे जो युक्त था वह सुषुप्तिमें उन रूपोंके विनाशसे अनेक तण्डुलोंका पिष्ट जैसे एकरूप हो जाता है, वैसे ही एकरूप हो गया । प्रज्ञान चैतन्य है । जागरणमें वृत्तियोंके अनेक होनेसे जीवका चैतन्य उस समयमें शिथिल हो जाता है,


[email protected]