सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 120 of 590
Read in context| ९० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ प्रथम परिच्छेद |
|---|
विवेकस्तु तयोर्बृहदारण्यके—'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति' इति जीवाभिप्रायेणोपाधिविनाशानुपविनाशप्रति-
[ 'इदं रजतम्' (यह रजत है ) इत्यादि भ्रमस्थलमें 'यह शुक्ति है' इस प्रकारके विशेष परिज्ञानसे 'इदं रजतम्' इससे प्रतीत सामान्य और विशेष पदार्थोंमें शुक्तित्व और रजतत्वरूप विरुद्ध धर्मोंका निश्चय होनेसे उनका भेद माना जाता है, परन्तु प्रकृतमें जीव और कूटस्थका भेद कैसे अवगत हो सकता है ? यदि भेदका परिज्ञान न हो, तो 'स्वयमहम्' ( मैं स्वयम् ) इस प्रकार सामान्यविशेषभावसे प्रतीयमान जीव और कूटस्थका सत्यस्थलीय रजत और इदमर्थके समान वस्तुतः एकत्वापत्ति होनेसे अहमर्थ-जीवकी स्वयंशब्दार्थ-कूटस्थमें कल्पना नहीं हो सकती, इस प्रकारकी आशङ्का करके श्रुतिसे उनका भेद दिखलाते हैं ]—बृहदारण्यकमें जीव और ईश्वरका भेदानुभव तो 'प्रज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय०' (प्रज्ञानरूप आत्मा ही देहादिरूपसे परिणत सन्निहित उपाधिरूप भूतोंसे समुत्थानकर—उपाधिभूत बुद्धि आदिकी उत्पत्तिसे उत्पत्तियुक्त होकर—तत्त्वज्ञानसे उन उपाधियोंका विनाश होनेपर उन्हीं भूतोंमें लीन हो जाता है) इत्यादि श्रुतिसे जीवके अभिप्रायसे ही अर्थात् जीवका ही उपाधिके विनाशके अनन्तर विनाशप्रतिपादन
है—जैसे इदन्त्व शुक्तिमें रहता है, वैसे ही पट आदिमें भी रहता है। इस विशेष पक्षके संग्राहक निम्न लिखित श्लोक हैं—
'अविद्यावृतकूटस्थे देहद्वययुता चितिः ।
शुक्तौ रूप्यवदध्यस्ता विक्षेपाध्यास एव हि ॥३३॥
आरोपितस्य दृष्टान्ते रूप्यं नाम यथा तथा ।
कूटस्थाध्यस्तविक्षेपनामाहमिति निश्चयः ॥३६॥
इदमंशं स्वतः पश्यन् रूप्यमित्यभिमन्यते ।
तथा स्वं च स्वतः पश्यन्नहमित्यभिमन्यते ॥३७॥
इदन्त्वरूप्यते भिन्ने स्वत्वाहमन्ते तथेष्यताम् ।
सामान्यं च विशेषश्च ह्युभयत्रापि गम्यते ॥३८॥
देवदत्तः स्वयं गच्छेत्त्वं वीक्षस्व स्वयं तथा ।
अहं स्वयं न शक्नोमीत्येवं लोके प्रयुज्यते ॥३९॥' [पञ्च० चित्रदी०]
इन श्लोकोंके आधारपर ही 'अयञ्चापरस्तदभिहितो विशेषः' इत्यादिसे विशेष बात कही गई है, और जो मूलमें विशेष कहा है, वही इन श्लोकोंका अर्थ है, अतः श्लोकोंका अनुवाद नहीं किया गया।