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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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यह आधार चक्र अपने चार दलों से युक्त है, उन दलों में वं, शं, षं, सं, ये
चार अक्षर हैं। इस मूलाधार कमल के ध्यान से शरीर की कान्ति बढ़ जाती है
जठराग्नि प्रदीप्त होती है, शरीर नीरोग रहता है। साधक तीनों काल का ज्ञाता
हो जाता है। इस चक्र के ध्यान से योगी के सभी पाप क्षणमात्र में नष्ट
हो जाते हैं। योगी मन, बिन्दु और प्राण, तीनों को अपने वश में कर लेता है।
द्वितीयं स्वाधिष्ठानं चक्रं तन्मध्ये पश्चिमाभिमुखलिङ्गं
प्रवालाङ्कुरसदृशं ध्यायेत् तत्रैवोड्डियानपीठं जगदाकर्षणं
भवति ॥ २ ॥
दूसरा स्वाधिष्ठान चक्र है। उसके बीच में पीछे की ओर मुख वाला प्रवालांकुर
मूंगे के अग्रभाग के सदृश ( लाल रंग का ) शिवलिंग है, इसका ध्यान करना
चाहिये, यहीं उड्डियान पीठ भी है, इस लिंग का ध्यान करने से समस्त जगत्
साधक की ओर सहज खिंच जाता है, शिवलिंग की उपासना से जगत् के प्राणो
को साधक अपनी ओर आकृष्ट करने की सामर्थ्य प्राप्त करता है ॥ २ ॥
विशेष --'स्व' शब्द प्राण का वाचक है, इसलिये स्वाधिष्ठान प्राणचक्र है।
स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः ।
( गोरक्षशतक २२ )
यह स्वाधिष्ठान-चक्र मेढ़ में स्थित है।'यह छः दलों का कमल ( चक्र )
है। यह माणिक्य के समान लाल रंग का है। छः दलों पर क्रमशः वं, भं, मं,
यं, रं, लं अक्षर अंकित होते हैं। इस चक्र में आत्मा का ध्यान कर योगी सुखी
होता है।
स्वाधिष्ठाने च षट्पत्रे सन्माणिक्यसमप्रभे ।
नासाग्रदृष्टिरात्मानं ध्यात्वा योगी सुखो भवेत् ॥
( गो० संहिता २ । ६५)
स्वाधिष्ठान चक्र के ध्यानी को समस्त न सुने शास्त्रों का ज्ञान हो जाता
है। उसका शरीर रोगरहित हो जाता है। वह संसार में अभय रहता है।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३५