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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 76 of 222

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षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् ।
स्वदेहे ये न जानन्ति कथं सिद्ध्यन्ति योगिनः ॥
आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ।
योनिस्थानं द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते ॥
आधाराख्यं गुदास्थानं पङ्कजं च चतुर्दलम् ।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाक्षा सिद्धवन्दिता ॥
योनिमध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखस्थितम् ।
मस्तके मणिवद् बिम्बं यो जानाति स योगवित् ॥
तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ।
त्रिकोणं तत्पुरं वह्नेरधोमेढ्रात् प्रतिष्ठितम् ॥
यत्समाधौ परं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ।
तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातं न विद्यते ॥
( गोरक्षशतक १३, १७-२१ )
मूलाधार-चक्र और स्वाधिष्ठान चक्र के मध्य में स्थित योनिस्थान को
कामरूप कहा जाता है। मूलाधार नामक चार दल वाले कमल ( चक्र ) के,
जो गुदास्थान में है, मध्य में त्रिकोणाकार योनि है, यही योगसिद्धों द्वारा वन्दित
कामाक्षा पीठ है। उस कामाक्षा के मध्य में पश्चिमाभिमुख महालिंग है, उसके
मस्तक में मणि के समान प्रदीप्त बिम्ब को जो अच्छी तरह जानता है, वही योग-
वेत्ता है। लिङ्गस्थान के नीचे मूलाधार पद्म की कर्णिका में तप्त स्वर्ण वर्ण
और विद्युल्लेखा के समान ज्योतित त्रिकोणाकार अग्निमय योनिस्थान है।
समस्त दिशाओं में व्याप्त इस परम ज्योति का महायोगसमाधि में स्थित योगी
दर्शन कर मुक्त हो जाता है।
मूलाधार कमल ( चक्र ) ही ब्रह्मचक्र है। यह मूलाधार-चक्र कुलचक्र
भी कहलाता है। इस में कुण्डलिनी निवास करती है। कुण्डलिनी के स्थान में ही
बन्धूक-पुष्प के समान लाल वर्ण के तेज से युक्त कामबीज है। यह तपाये हुए
स्वर्ण के समान उज्ज्वल और प्रयुक्त अक्षरस्वरूप है। यह काम-बीज शरद के
चन्द्रमा के समान दीप्त और करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी तथा करोड़ों चन्द्रमा
के समान शीतल होता है।
तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकीर्तितम् ॥
( शिवसंहिता ५।१६ )
३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति