सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextसर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥
(शिवसंहिता ५।१०१)
स्वाधिष्ठान चक्र का ध्यान करने वाले योगी की शारीरिक दिव्य कान्ति से
लोग सम्मोहित हो उठते हैं । उसे अनेकानेक सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं, पर
वह इन्हें साधना में बाधक मानकर आत्मलीन रहता है ।
तृतीयं नाभिचक्रं पञ्चावर्तं सर्पवत् कुण्डलाकारं तन्मध्ये
कुण्डलिनीशक्तिं बालार्ककोटिसदृशीं ध्यायेत् सा मध्यमा
शक्तिः सर्वसिद्धिदा भवति ॥ ३ ॥
तीसरा नाभिचक्र (मणिपूरक) है। यह सर्प के समान कुण्डलाकार नाड़ी
से पाँच वलयों में वेष्टित है, इस चक्र के मध्य में अरुणोदयकालीन करोड़ों सूर्य
की प्रभा के समान विभासित कुण्डलिनी शक्ति का (योगी को) ध्यान करना
चाहिये । यह मध्यमा शक्ति है, इसके ध्यान मात्र से समस्त सिद्धियों की प्राप्ति
होती है । (यह मूलाधार में स्थित सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति की ही ज्योतिर्मयी
विशिष्ट अवस्था है। इसके ध्यान से चित्त में सत्वगुण प्रवाहित होता है।
मूलाधारस्थ कुण्डलिनी तीन वलयों में वेष्टित होती है ।) मणिपूरक-चक्र में
ज्योतित पाँच वलयों में वेष्टित कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति है ॥ ३ ॥
विशेष—यह स्वर्ण-वर्ण का कमल है, इसके दस दलों पर क्रमशः ड से फ
तक—डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं, वर्णमाला अंकित है। इस चक्र का ध्यान
करने से पाताल नाम की सिद्धि प्राप्त होती है, योगी इसका ध्यान कर सदा
सुखी रहता है । जगत् में उसकी अभीष्ट कामनायें पूरी होती हैं, दुःख-रोग नष्ट
होते हैं, मृत्यु का भय टल जाता है और परकाय-प्रवेश की शक्ति प्राप्त होती है,
स्वर्णादि बनाने की सिद्धि प्राप्त होती है, औषधि—जड़ी-बूटी तथा पृथ्वी के भीतर
छिपी रत्नादि निधि का ज्ञान होता है ।
तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञकम् ।
दशारण्डादिफान्तार्णं शोभितं हेमवर्णकम् ।
तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके ।
तस्य पातालसिद्धिः स्यान्निरन्तरसुखावहा ॥
ईप्सितं च भवेल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥
३६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति