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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 55 of 222

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दाहकत्वं पाचकत्वमुष्णत्वं प्रकाशत्वं रक्तवर्णत्वमिति
पञ्चगुणं महातेजः ॥ ३४ ॥
महातेज के पाँच गुण हैं। पहला गुण दाहकत्व है, यह पृथ्वी और जल में
दाहकत्व पहुँचा कर उन्हें जलाता है। इसका दूसरा गुण पाचकत्व है, यह जठरादि
में भोजन आदि सामग्री को पचाता है। तीसरा गुण उष्णत्व है। यह पदार्थों में
उष्णता पैदा करता है। चौथा गुण प्रकाश है। यह सभी पदार्थों को प्रकाशित
प्रत्यक्ष करता है। पाँचवां गुण रक्तवर्णत्व है। यह लाल रंग का होता है ॥ ३४ ॥
महाप्रवाह श्राप्यायनं द्रवो रसः श्वेतवर्णत्वमिति पञ्चगुणं
सलिलम् ॥ ३५ ॥
सलिल ( जल ) के पाँच गुण होते हैं। पहला गुण प्रवाह है, यह बहता
रहता है। दूसरा गुण आप्यायन है, यह उमड़ता रहता है। तीसरा गुण द्रव है,
यह द्रवित ( पिघलता ) रहता है। चौथा गुण रस है, यह स्वाभाविक मधुर और
आस्वाद्य होता है। इसका पाँचवां गुण श्वेतवर्णत्व है, यह श्वेत रंग का होता
है, निर्मल रहना इसका स्वभाव है ॥ ३५ ॥
स्थूलता नानाकारता काठिन्यं गन्धः पीतवर्णत्वमिति
पञ्चगुणामहापृथ्वी । इति महासाकारपिण्डस्य पञ्चतत्त्वं पञ्च-
विंशति गणाः ॥ ३६ ॥
महापृथ्वी के पाँच गुण हैं। पहला गुण स्थूलता है, यह स्थूल है। दूसरा
गुण नानाकरता है, पर्वत, तरु, लता, सम, विषम रूप धारण करना इसका स्वभाव
है। तीसरा गुण काठिन्य है, यह कड़ी होती है। चौथा गुण गन्ध है। पाँचवां
गुण पीतवर्णत्व है, इसका रंग पीला होता है। चित्-अचित् विशिष्ट महासाकार
पिण्ड, पञ्चभूतात्मक समष्टिरूप पिण्ड के आकाशादि पाँच रूप अथवा अंग हैं।
एक-एक अंग के पाँच-पाँच गुण हैं। इस तरह महासाकार पिण्ड के पाँच तत्त्वात्मक
पचीस गुण हैं। यह महासाकार पिण्ड पञ्चतत्त्वात्मक और पचीस गुणों से विशिष्ट
( शिवात्मक ) है ॥ ३६ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३