सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
Page 54 of 222
Read in contextसोऽहं भाव के पाँच गुण हैं। पहला गुण अहंता है—मैं ही सर्वत्र व्यापक
हूँ। दूसरा गुण अखण्ड ऐश्वर्य है। तीसरा गुण स्वात्मता (सर्वत्र आत्मबुद्धि—
सब में अपने आपको व्याप्त देखना) है। चौथा गुण विश्वानुभवसामर्थ्य—स्थूल
और सूक्ष्म समस्त पदार्थों को प्रत्यक्ष करने की शक्ति है और पाँचवां गुण सर्वज्ञत्व
अतीत और अनागत विषयक ज्ञान की शक्ति है। इस तरह आद्यपिण्ड के
परमानन्दादि पाँच देवता ही पाँच अंग हैं तथा प्रत्येक के अंग में पाँच-पाँच गुण
ही पचीस गुण हैं। इन्हीं परमानन्द आदि पाँच देवों का समवाय महत्तत्व रूप
आद्यपिण्ड है। यही आद्यपिण्ड पुरुष हिरण्यगर्भ के नाम से प्रसिद्ध है ॥ ३० ॥
आद्यान्महाकाशो महाकाशान्महावायुर्महावायोर्महातेजो
महातेजसो महासलिलं महासलिलान्महापृथ्वी ॥ ३१ ॥
पाँच भूतों का कारण आद्यपिण्ड सूत्रात्मा है। उससे महाकाश उत्पन्न है;
महाकाश से महावायु उत्पन्न है, महावायु से महातेज उत्पन्न है, महातेज से
महासलिल उत्पन्न है, महासलिल से महापृथ्वी उत्पन्न है ॥ ३१ ॥
अवकाशोऽच्छिद्रमस्पृशत्वं नीलवर्णत्वं शब्दत्वमिति पञ्च-
गुण अवकाशः ॥ ३२ ॥
आकाश के पाँच गुण हैं। पहला गुण अवकाश है, पोल होने से यह समस्त
पदार्थों का आश्रय है। दूसरा गुण अच्छिद्रत्व—छेद न होना है। आकाश में छिद्र
नहीं है। तीसरा गुण अस्पृशत्व है, इसका स्पर्श नहीं किया जा सकता है, यह
असंग है। चौथा गुण नीलवर्णत्व है, यह आकाश नीले वर्ण (रंग) का है।
पाँचवां गुण शब्दत्व है, यह आकाश शब्द (ध्वनि) से परिपूर्ण है ॥ ३२ ॥
सञ्चारः सञ्चालनं स्पर्शनं शोषणं धूम्रवर्णत्वमिति पञ्च-
गुणो महावायुः ॥ ३३ ॥
महावायु के पाँच गुण हैं। पहला गुण सञ्चार है, वायु चलने की क्रिया
युक्त रहती है। दूसरा गुण सञ्चालन है। स्वयं चलती रहने से यह अन्य पदार्थों
को भी चलाती रहती है। तीसरा गुण स्पर्श है। यह समस्त पदार्थों का स्पर्श
करती रहती है। चौथा गुण शोषण है, यह जलादि से युक्त पदार्थों को सुखाती
है। पाँचवां गुण धूम्रवर्णत्व है, वायु धूम के रंग की होती है ॥ ३३ ॥
१२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति