सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in context'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' रचना निस्सन्देह सिद्धों के सिद्धान्त का अक्षर वाङ्मय
है और सिद्धपुरुषों द्वारा परम्परा से स्वीकृत है । इसकी लोकप्रियता का प्रमाण
यह है कि अभी प्रायः दो सौ साल पहले काशी के प्रसिद्ध नाथयोगमर्मज्ञ
बलभद्र ने इसके सारतत्व को स्वरचित श्लोकों में अनुस्यूत कर 'सिद्धसिद्धान्त
संग्रह' का प्रणयन किया, जो इस योग-ग्रन्थ को समझने का एक विशिष्ट माध्यम
है । किन्हीं कृष्णराज के निर्देश से बलभद्र ने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' रूप पुण्यकार्य
सम्पादित किया था । उनका कथन है :
यत्पदाब्जरजः स्पर्शादरजस्कं मनो भवेत् ।
स एव गुरुनाथो मे कृपासिन्धुः प्रसीदताम् ॥
अथो ये सिद्धसिद्धान्तपद्धतौ सुनिरूपिताः ।
संग्रहं तनुते तेषां कश्चिच्छ्रीकृष्णतुष्टये ॥
( सिद्धसिद्धान्तसंग्रह १ । १-२ )
बलभद्र ने श्रीनाथ गुरु—साक्षात् श्रीगोरखनाथ के ही पदकमलों में प्रणति
के परिणामस्वरूप उनकी प्रसन्नता अथवा अनुग्रह से मन का अरजस्क—निर्मल
होना स्वीकार किया है। उन्होंने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' में 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का
साधारणीकरण किया है । 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' का प्रकाशन महामहोपाध्याय
गोपीनाथ कविराज ने सन् १६२५ में सरस्वती भवन 'टेक्स्ट सीरीज' के अन्तर्गत
काशी से किया था ।
मैंने संस्कृत का मूलपाठ अत्यन्त संशोधितरूप में सिद्धपूरवाड़ा कुटी
गान्धारा, जालन्धर द्वारा प्रकाशित और सम्राट प्रेस, पहाड़ी धीरज दिल्ली द्वारा
मुद्रित 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' से लिया है । यह अत्यन्त प्रामाणिक और शुद्ध है तथा
इसके दो संस्करण सन् १६४० ई० और १६७१ ई० में क्रमशः प्रकाशित हो चुके
हैं । इसकी संस्कृत टीका महामहोपाध्याय द्रव्येश झा ने लिखी है और इसका हिन्दी
रूपान्तर योगी भीष्मनाथ ने किया है । मैंने अपने हिन्दी रूपान्तर में द्रव्येश झा
महोदय की टीका से भी थोड़ी-बहुत सहायता ली है, इससे मैं अपने हिन्दी-भाष्य
को अधिक सुगम-सहज-सुबोध कर सका ।
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के उपर्युक्त संस्करण का अंग्रेजी में सारतत्व प्रस्तुत
करने में डॉ० कल्याणी मल्लिक ने भी उपयोग किया और इस तरह 'सिद्धसिद्धान्त-
पद्धति' की लोकप्रियता बढ़ाने में उनका योगदान कम नहीं है । गोरखनाथ
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