सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextविचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार, पिण्डपदसमरसभाव और नित्यावधूत-लक्षण
का उपदेश करते हुए गोरखनाथजी ने हठयोग - प्राण-साधना के परिप्रेक्ष्य में
परम पद की प्राप्ति को ही नाथयोग का प्रतिपाद्य स्वीकार किया है । उन्होंने
समस्त तत्वों की समावस्था के निरुद्यम-सहज स्थिति को समाधि कहते हुए
उसकी असम्प्रज्ञात-चरमावस्था में परमपद की प्राप्ति सिद्ध की है । उन्होंने
नाथयोग का परम तत्व इस सिद्धान्त में स्थिर किया है कि पिण्ड में अखण्ड
ब्रह्माण्ड की सहज अभिव्यक्ति के माध्यम से परमात्म ज्योति का पूर्ण साक्षात्कार
होता है । यही सिद्ध-मार्ग कहा गया है । गोरखनाथजी ने अपनी प्रसिद्ध रचना
'योगबीज' में इस कथन की प्रामाणिकता अंकित की है ।
नानामार्गैस्तु दुष्प्राप्यं कैवल्यं परमं पदम् ।
सिद्धमार्गेण लभ्येत नान्यथा शिवभाषितम् ॥
उन्होंने इस कथन की पुष्टि के लिये इसे शिवभाषित - शिव-उपदिष्ट कह
कर इसके सत्सिद्धान्तस्वरूप की रक्षा की है। उन्होंने परमपद को स्वसंवेद्य कहा
है, स्वसंवेद्य कह कर योगमार्ग का सर्वतन्त्रस्वरूप स्पष्ट किया है ।
'स्वसंवेद्यमेव परमपदम् ।'
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । ४ )
यद्यपि परम पद स्वसंवेद्य है, अपरोक्षानुभवैकगम्य है, तथापि जिस साधक
पर सद्गुरु की कृपा नहीं होती अथवा जो साधक सद्गुरु के योगोपदेशामृत से
वंचित रह जाता है, वह परम पद को प्राप्त नहीं कर सकता है ।
प्रसादात्सद्गुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ।
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अतएव - परमपदप्राप्त्यर्थं स सद्गुरुः सदा वन्दनीयः ॥
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । ६५, ७० )
इस परम पद की प्राप्ति की दिशा में अधः शक्ति के रूप में प्रसुप्त कुण्डलिनी
का प्रबोधन आवश्यक है । मूलाधार में सुप्त कुण्डलिनी अपनी सुप्तावस्था से जाग
कर मणिपूरक और अनाहत चक्र को पार करने के उपरान्त प्रकाशस्वरूपिणी हो
उठती है । यह मध्याशक्ति कहलाती है और आज्ञाचक्र का भेदन कर ऊर्ध्वशक्ति
के रूप में सहस्रार में प्रवेश कर शिवस्वरूप हो जाती है ।
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