सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextएण्ड दि कनफटा योगीज' अंग्रेजी ग्रन्थ के प्रणेता महामति ब्रिग्स ने भी
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की चर्चा की है और गोरखनाथकृत इस रचना के अतिरिक्त
उन्होंने नित्यानन्दकृत 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' नामक एक और रचना का उल्लेख
किया है। 'गोरक्षसिद्धान्त संग्रह' में इन्हीं नित्यानन्द को नित्यनाथ कहा गया है
और उसमें नित्यनाथकृत 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' से दो-तीन श्लोक उद्धृत हैं, जो
बहुत ही मार्मिक हैं और गोरक्षसिद्धान्त का विशिष्ट प्रतिपादन करते हैं ।
उनमें से ( १।३ ) एक है :
न ब्रह्मा विष्णुरुद्रौ न सुरपति सुरा नैव पृथ्वी न चापो
नैवाग्निर्नार्पि वायुर्न च गगनतलं नो दिशा नैव कालः ।
नो वेदा नैव यज्ञा न च रविशशिनौ नो विधिर्नैव कल्पाः
स्वयं ज्योतिः सत्यमेकं जयति तव पदं सच्चिदानन्दमूर्ते ।
सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर ! आप के परमपदतक ब्रह्मा, विष्णु और
रुद्र, इन्द्र और देवगण, पृथ्वी, जल, अग्नि वायु, आकाश, दिशाएँ, काल, वेद,
यज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा, विधि-कल्प की भी पहुँच नहीं है, एकमात्र सत्स्वरूप निजा
शक्ति—ज्योति ही उस परम पद में अभिव्यक्त है ।
महायोगी गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में योगसाधकों के संतोष
और आत्मतृप्ति के लिये यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि जो कुछ भी इस शरीर
में सुखानुभव है, वही स्वर्ग है और जो दुःख है, वही नरक है। सकाम कर्म ही
बन्धन है, निर्विकल्पता ही मुक्ति है, द्वैत-प्रपंच की शान्ति से ही यह मुक्ति सुलभ
होती है ।
यत्सुखं तत्स्वर्गं यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्म तद्बन्धनं यन्निर्विकल्पं
तन्मुक्तिः ।
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३ । १३ )
यह स्वीकार करना नितान्त युक्तिसंगत और अत्यन्त समीचीन है कि
महायोगी गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में सनातन, परम्परागत योग का
स्वरूप साधना और दर्शन के स्तर पर सुनिश्चित किया। योग सार्वभौम जीवन-
दर्शन का प्रयोगात्मक सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है, जिसके समाश्रय में सांख्य, न्याय,
वैशेषिक, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा को क्रमशः प्रकृति-पुरुष के तत्वात्मक
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