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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 36 of 222

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यद्यपि गोरखनाथजी की योगदृष्टि में हिरण्यगर्भ का 'योगानुशासन' था,
तथापि उन्होंने पार्वती के प्रति शिव द्वारा सप्तशृंग पर उपदिष्ट महाज्ञान का,
जिसका महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथ ने श्रवण कर उन्हें गुरु-परम्परा को सजीव
रखने के लिए प्रदान किया था, 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नाथयोग के रूप में
स्पष्ट प्रतिपादन है। हिरण्यगर्भ के 'योगानुशासन' से यही 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की
विशिष्टता है और यही कारण है कि गोरखनाथजी की यह रचना निरन्तर अपनी
मौलिकता में प्रतिष्ठित है और योगसाधना की सिद्धि के स्तर पर भविष्य में भी
प्राणवान् अंग के रूप में स्वीकृति होती रहेगी । गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्त
पद्धति' शास्त्र को महादिव्य पारमेश्वर रहस्य का सिद्धान्त कहा है । सिद्धों का
अनुभवस्वरूप 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' योगशास्त्र साक्षात् अनुभव है, आत्मानन्द प्रदान
करने वाला है और सर्वसन्देहनाशक है, सत्स्वरूप है ।
एतच्छास्त्रं महादिव्यं रहस्यं पारमेश्वरम् ।
सिद्धान्तं सर्वसारस्य नानासंकेतनिर्णयम् ॥
सिद्धानां प्रकटं सिद्धं सद्यः प्रत्ययकारकम् ।
आत्मानन्दकरं नित्यं सर्वसन्देहनाशनम् ॥
( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ६७-६८ )
गोरखनाथजी द्वारा उपदिष्ट योग महाज्ञान ही नाथयोग-मार्ग का साधन
तत्व है । यही कारण है कि नाथयोगमार्ग को सिद्धमत, सिद्धामृत मार्ग अथवा
अवधूत-मार्ग कहा गया है । यद्यपि नाथ-सम्प्रदाय में अनेक महत्वपूर्ण योगग्रन्थों की
रचना हो सकी है, तथापि 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ग्रन्थ ऐसा सिद्धान्त-प्रतिपादक
दूसरा ग्रन्थ कोई है ही नहीं । वास्तव में यह योगदर्शन का सम्पूर्ण विवेचनात्मक
विचार-वाङ्मय है और इस योगज्ञान में गोरखनाथजी ने बड़ी रहस्यमयी सूक्ष्म-
दृष्टि के द्वारा साधन-प्रक्रिया भर दी है, पर उसका अभ्यास सिद्धपुरुष अथवा
अवधूत गुरु की ही देख-रेख में सम्भव है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के गहन परिशीलन
से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस अप्रतिम नाथयोगशास्त्र में योगदर्शन
तथा प्रक्रिया—साधनाभ्यास का सफल समन्वय हो सका है ।
योगविषय का प्रतिपादन 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी ने करते हुए
जिस प्रत्यक्षानुभूति-अपरोक्षानुभूति के सहारें परमात्मा के अखण्ड—अलख निरञ्जन
स्वरूप का निजाशक्ति के समाश्रय में वर्णन किया है, वह अन्यत्र असाध्य भले
ही न हो, दुर्लभ तो है ही । इस योगशास्त्र के छः अध्यायों में पिण्डोत्पत्ति, पिण्ड-

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