सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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महायोगी शिवगोरक्ष भगवान् गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ऐसे
असाधारण तथा अपूर्व, परमदिव्य योगशास्त्र की रचना कर आधिदैविक, आधि-
दैहिक और आधिभौतिक दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति प्रकाशित कर आध्यात्मिक
मुक्ति का विधान प्रशस्त किया। यह विधान ही सिद्ध-साधना-पद्धति में सिद्धान्त
कहा गया है। यह पिण्डगत साधना की ब्रह्माण्ड में अखण्ड परमात्मस्वरूप की
अनुभूति का सच्छास्त्र है। गोरखनाथजी की दृष्टि में यह सिद्धान्त का सार
है, श्रेयस्कर और प्रासादिक अथवा निर्मल है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का उपसंहार
करते हुए उन्होंने अभिमत व्यक्त किया है।
'पिण्डे सर्वगतं विधानममलं सिद्धान्तसारं वरम्।'
(सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६।६३)
नाथ-सम्प्रदाय अथवा सिद्धामृत मार्ग ही नहीं, सम्पूर्ण नाथयोग तथा
सामान्य-असामान्य योग-साधना के धरातल पर 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' गोरखनाथजी
की अप्रतिम देन है। पतञ्जलि का योगदर्शन तो योग के आदिवक्ता भगवान्
हिरण्यगर्भ के योगानुशासन का सूत्रात्मक संकेत मात्र है और महर्षि ने आरम्भ में
ही हिरण्यगर्भ की योगकृति का सन्दर्भ व्यक्त किया है :
'अथ योगानुशासनम्'
(योगसूत्र १।१)
इस सन्दर्भ का तात्पर्य यह है कि पतञ्जलि ने योग का जो कुछ भी निदर्शन
किया है, उसका आधार-वाङ्मय हिरण्यगर्भ का 'योगानुशासन' है। महाभारत में
योग के वक्ता हिरण्यगर्भ का उल्लेख है।
हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः।
(महाभारत शान्ति० ३४७।६५)
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