सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextकुलं सर्वात्मकं पिण्डमकुलं सर्वतोमुखम् ।
तयोरैक्यपदं शक्तिर्यस्तां वेद स शक्तिभाक् । ४८ ।
कौलं सर्वकलाग्रासः सकृतः सततं यया ।
तां शक्तिं यो विजानाति शक्तिज्ञानी स कथ्यते ।
ज्ञात्वा कुलाकुलं तत्वं सक्रमेण क्रमेण तु ।
स्वप्रकाशमहाशक्त्या ततः शक्तिपदं लभेत् । ४९ ।
अलख निरञ्जन, द्वैताद्वैतविलक्षण, आधार-आधेयरहित ( सर्वव्यापक ),
अखण्ड, अविनाशी परमशिव की उपासना का व्रती होने से ( इस तरह का
उपासक ) महाव्रती कहा जाता है । पिण्डरूप, कार्यात्मक ( सर्वात्मक ) समष्टि-
सृष्टिरूप ( शिव ) ही कुल है, अखण्ड चिद्रूप, अपने में ही निजाशक्ति को
संवरित करनेवाला ( शिव ) अकुल है, कुल-अकुलरूपिणी शक्ति—कुल-अकुल की
एकता की महाकारणशक्ति को जाननेवाला ही शक्ति-उपासक ( शाक्त ) कहा
जाता है । जिस शक्ति के द्वारा नित्य प्राणादिवस्तु उपादानरूप समस्त कलाओं
का ग्रास-विलय कर दिया जाता है, उस प्रलयकारिणी ( महाकाली ) को जानने
वाला ःशक्तिज्ञानी कहा जाता है । क्रमपूर्वक कुल-अकुल शक्ति से तादात्म्य स्थापित
करनेवाला ( उपासक ) शक्तिपद को प्राप्त करता है अथवा कुलाकुलतत्व को
यथाक्रम जानकर उसी क्रम से स्वप्रकाशचिद्रूपिणी महाशक्ति में
( स्वाधिष्ठानपूर्वक ) ऐक्य स्थापित करनेवाला साधक शक्तिपद में स्थित
होता है ॥ ४७-४९ ॥
मदो मद्य मतिर्मुद्रा माया मीनं मनः पलम् ।
मूच्छैनं मैथुनं यस्य तेनासौ शाक्त उच्यते । ५० ।
( तन्त्र-उपासना के क्षेत्र में वामाचार में मद्य, मुद्रा, मीन, मांस और
मैथुन, पंचमकार का सेवन विहित सिद्ध करनेवाले वाममार्गियों ने समाज में साधन
सम्बन्धी सत्स्वरूप की प्राप्ति के प्रति व्यामोह उत्पन्न कर दिया ।
महायोगी गोरखनाथजी ने इस व्यामोह का खण्डन किया । ) जीव का अहंकार
से प्रेरित होकर अपने को ही सर्वशक्तिमान् मानना ही मद अथवा अभिमान है,
यही मद्य है । जीव की कामना—अभिलाषा-पूर्ति की इच्छा अथवा मति ही मुद्रा
है, शष्कुली ( पूड़ी ) के रूप में मुद्रा का अर्थ नहीं घटित होता है । इसी तरह
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