सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवही अवधूत योगी शैव है । जो विषय-भोग में उद्दीप्त-रागासक्त समस्त
इन्द्रियों को प्रत्याहारित ( नियन्त्रित ) कर अखण्ड आत्मस्वरूप में लीन कर देता
है, वही योगी तपस्वी ( तापस ) 'कहलाता है, अंगों को भस्म से रञ्जित करने
वाला तापस नहीं होता । जो कर्मजालरूप पशुत्व ( जीवभाव ) का त्याग कर
अखण्ड, परात्पर, पूर्णतम परमशिव की उपासना में तत्पर होकर शिवरूप में
प्रतिष्ठित हो जाता है, वही वास्तव में पाशुपत ( शैव ) है ॥ ३८-४२ ॥
परानन्दमयं लिङ्गं निजपीठे सदाऽचले ।
तल्लिङ्गं पूजितं येन स वै कालमुखो भवेत् । ४३ ।
विलयं सर्वतत्त्वानां कृत्वा संधार्यते स्थिरम् ।
सर्वदा येन वीरेण लिङ्गधारी भवेत्तु सः । ४४ ।
अन्तकादीनि तत्त्वानि त्यक्त्वा मग्नो दिगम्बरः ।
यो निर्वाणपदे लीनः स निर्वाणपरो भवेत् । ४५ ।
स्वस्वरूपामकं ज्ञानं समन्त्रं तत् प्रपालितम् ।
अनन्यत्वं सदा येन स वैकापालिको भवेत् । ४६ ।
जो सच्चिदानन्दस्वरूप, संसार का कारणरूप अपने नित्यधाम में सदा
स्थित है, उस लिङ्ग ( परमेश्वर शिव ) की पुष्पचन्दनादि से उपासना-पूजा
करने वाला कालमुख कालजयी महाकाल का उपासक कहलाता है । जो समस्त
भौतिक तत्व के प्रति विद्यमान अहंकार-भाव का—संसाराभिमानरूप शत्रु का
वीरतापूर्वक दमन कर देता है, वही वीरशैव—लिङ्गधारी कहा जाता है । जन्म-
मरण आदि विनश्वर वस्तुओं का परित्याग कर संसारात्मक आवरण से जो
रहित होता है तथा परब्रह्म परमेश्वर में लीन रहता है, वही दिगम्बर, निर्वाण में
स्वस्थ—निर्वाणी संन्यासी कहा जाता है । जो गुरु से मन्त्र प्राप्त कर उनके द्वारा
उपदिष्ट साधन-मार्ग पर चलते हुए अपने शिवस्वरूप में बोधयुक्त तथा अनन्य
रहता है, एकमात्र अपने उपास्य का ही ध्यान और चिन्तन करता है, वही
कापालिक कहा जाता है ॥ ४३-४६ ॥
महाव्याप्तिपरं तत्त्वमाधाराधेयवर्जितम् ।
तद् व्रतं धारितं येन स भवेद् वै महाव्रतः । ४७ ।
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