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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 100 of 222

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संकोच करने से इड़ा और पिंगला नाड़ियों का स्तम्भन हो जाता है, प्राण
सुषुम्ना से प्रवाहित होते हुए ऊर्ध्वमुख होता है। यह कण्ठाधार सोलहों आधारों
के बन्धनकर्ता मध्यचक्र-अथवा विशुद्धचक्र का स्थान है।
जालन्धर बन्ध के अभ्यास द्वारा साधक इड़ा-पिंगला में प्राणवायु के
संचालन पर नियन्त्रण कर मानसिक-जैविक शक्ति को सुषुम्ना-मार्ग से ऊर्ध्वमुखीकर
सकता है।
नवमे घण्टिकांधारे जिह्वाग्रं धारयेदमृतकला
स्रवति ॥ १८ ॥
नौवां घण्टिका आधार है। ( मुख के भीतर तालु में लटकनेवाले काग
का नाम घण्टिका है । ) घण्टिका-आधार के मूल भाग में जिह्वा के अग्रभाग को
लगाना चाहिये । वहाँ ( सहस्रार कमल में स्थित चन्द्रमण्डल से ) अमृत का
स्राव होता है--( उस अमृत का पान करने से शरीर नीरोग और पुष्ट होता
है ) ॥ १८ ॥
ब्रह्मारन्ध्रे हि यत् पद्मं सहस्रारं व्यवस्थितम् ।
तत्र कन्दे हि या योनिस्तस्यां चन्द्रो व्यवस्थितः ॥
त्रिकोणाकारतस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम् ।
इडायाममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमा ॥
( शिवसंहिता ५ । १२६-१३० )
ब्रह्मारन्ध्र में सहस्रदल कमल है, इसके कन्द की योनि में चन्द्रमा है। इस
त्रिकोणाकार योनि से चन्द्रमा से सुधा का स्राव होता रहता है, जो सदा अमृत
धारा के रूप में इडा नाड़ी से प्रवाहित होता हैं। जिह्वा के मूल में एक सूक्ष्म मार्ग
है, उसी से यह अमृतकला टपकती है। यह इडा-पिंगला के द्वारा शरीर में निम्न
स्तर पर उतर कर नष्ट हो जाती है। जिह्वा को मोड़कर इस अमृत का संस्पर्श
कराना ही अमृतपान है, इससे घण्टिका आधार में जिह्वा के अग्र भाग से साधक
निरन्तर प्रवाहित अमृत का पान करता रहता है ।
दशमे ताल्वाधारे ताल्वन्तर्गर्भे लम्बिकां चालनदोहनाभ्यां
दीर्घीकृतवा विपरीतेन प्रवेशयेत् काष्ठी भवति ॥ १९ ॥
५८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति