सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextअष्टमे कण्ठाधारे कण्ठमूलं चिबुकेन निरोधयेदिडापिङ्गल-
योर्वायुः स्थिरो भवति ॥ १७ ॥
आठवाँ कण्ठाधार है। कण्ठमूल को चिबुक ( ठोडी ) से निरुद्ध कर
( जालन्धरबन्ध के अभ्यास द्वारा ) इडा और पिंगला - चन्द्रनाड़ी और सूर्यनाड़ी
में वायु को स्थिर किया जाता है। ( यही कुम्भक प्राणायाम की सिद्धि है। )
इस अभ्यास से वायु स्थिर होती है ॥ १७ ॥
विशेष-चिबुक से कण्ठमूल का निरोध होने पर सहस्रार से द्रवित
चन्द्रामृत नाभिस्थानीय अग्नि ( सूर्य के मुख ) में गिरकर नष्ट नहीं होता और
योगसाधक उस अमृत का स्वयं पान कर शरीर को जीर्ण-शीर्ण होने से बचा लेता
है। इस तरह कण्ठमूल के निरोधपूर्वक चिबुक के वक्षःस्थल पर लग जाने से
जालन्धर बन्ध सिद्ध होता है। मूल बन्ध, उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध के
अभ्यास हठयोग की साधना में अथवा प्राणायाम की सिद्धि में अमित उपयोगी हैं।
कण्ठमाकुञ्च्य हृदये स्थापयेच्चिबुकं दृढम् ।
बन्धो जालन्धराख्योऽयं जरामृत्युविनाशकः ॥
बध्नाति हि शिरोजालमधोगामिनभोजलम् ।
ततो जालन्धरो बन्धः कण्ठदुःखौघनाशनः ॥
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे ।
न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रकुप्यति ॥
कण्ठसंकोचनेनैव द्वे नाड्यो स्तम्भयेद् दृढम् ॥
मध्यचक्रमिदं ज्ञेयं षोडशाधारबन्धनम् ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३।७०-७३ )
कंठ ( गले के विवर ) को संकुचित कर ( सिकोड़ कर ) साधक को
हृदय-देश में ( वक्ष के समीप चार अंगुल की दूरी पर ) ठोड़ी को दृढ़तापूर्वक
स्थापित ( स्थित ) करना चाहिये। यह जरा ( बुढ़ापा ) और मृत्यु (के भय)
को नष्ट कर देनेवाला जालन्धर नामक बन्ध है। यह नाड़ियों के समूह और
नीचे की ओर गिरनेवाले कपालकुहर के जल-अमृत को बाँधता ( रोकता ) है,
इसलिये यह जालन्धरबन्ध गले के रोगों--विकारों को नष्ट करता है। जालन्धर
बन्ध के अभ्यास से और गले को सिकोड़ने से न तो ( कपाल-कुहर का ) अमृत
अग्नि ( जठरानल ) में गिरता है और न वायु ही दूषित होती है। कंठ का
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