सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextदसवाँ तालु आधार है। यह घण्टिका (घाँटी) से ऊपर है। तालु के
भीतर छिद्र-मार्ग से जीभ को चालन-दोहन-क्रिया से लम्बी कर उस छिद्र में उलट
कर प्रविष्ट करना चाहिये। (इससे खेचरी मुद्रा की सिद्धि होती है।) साधक
काठ के समान निश्चल हो जाता है। (इससे अमृतपान और खेचरी मुद्रा
का अभ्यास, दोनों सिद्ध होते हैं।) योगसाधक का काठ के समान निश्चल हो
जाना ही जड़समाधि है ॥ १६॥
विशेष—तालु आधार को तालुचक्र, दसवाँ द्वार, शंखिनी-विवर अथवा
अमृतस्राव-केन्द्र कहा जाता है। यह तालु आधार जीभ के अधिक गहरे क्षेत्र में
स्थित है। यह आन्तरिक रूप से आज्ञाचक्र और सहस्रार से जुड़ा है। खेचरी
मुद्रा के अभ्यास की सिद्धि के लिये जीभ को विधिपूर्वक कोमल बना कर बाहर
खींचते हुए लम्बा करना चाहिये, इसके बाद जीभ के अग्रभाग को जिह्वा के मूल
के कोमल छिद्र में प्रवेश कराया जाता है। साधक इस क्रिया के द्वारा समस्त बाह्य
चञ्चलता से रहित होकर काठ के समान जड़—निश्चल हो जाता है। यह जड़-
समाधि है और इस संज्ञा-शून्य स्थिति में भी सहस्रार से स्रवित अमृत के निरन्तर
पान से उसकी चेतना रसमयी—आनन्दमयी बनी रहती है।
खेचरी मुद्रा का लक्षण यह है कि कपाल के मध्यवाले छिद्र में जीभ उलटी
प्रविष्ट करनी चाहिये और साधक की दृष्टि दोनों भौंहों के मध्य स्थित रहनी
चाहिये। जीभ को इस मुद्रा की सिद्धि के लिये चालन-दोहन क्रिया से लम्बा
किया जाता है। अँगूठे और तर्जनी अँगुली से जीभ को दायें-बायें चालित करना
चालन-क्रिया है और जिस तरह गाय के स्तन में अँगुलियों को लगा कर दूध दुहा
जाता है, उसी तरह अंगूठे और तर्जनी अँगुली से जीभ को धीरे-धीरे बाहर की
ओर खींचकर बढ़ाया जाता है, यह दोहन-क्रिया है। अँगुलियों में इस क्रिया के
लिये मक्खन या घी लगा लेना चाहिये। निरन्तर अभ्यास करने से जीभ इतनी
लम्बी हो जाती है कि वह भ्रू-मध्य तक पहुँचकर कपाल-रन्ध्र से लग जाती है।
भ्रुवोरन्तर्गतां दृष्टिं विधाय सुदृढ़ां सुधीः ॥
उपविश्यासने वज्रे नानोपद्रववर्जितः।
लम्बिकोर्ध्वस्थितेगर्ते रसनां विपरीतगाम् ॥
संयोजयेत् प्रयत्नेन सुधाकूपे विचक्षणः।
मुद्रैषा खेचरीप्रोक्ता भक्तानामनुरोधतः॥
(शिवसंहिता ४। ५१-५३)
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ५६