शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
४२८ शुक्रनीतिः
| यद्वेश्यमुपदिश्य य | ३९२ | युद्धं कृत्वापि शस्त्रास्त्रैः | १७९ | रक्षितारं मृगयते | १७१ |
| यद्रूपं कर्तुमुद्युक्तः | ३३७ | युद्धं विनाऽन्यकार्येपु | ३५४ | रजतं षोडशगुणं | २१५ |
| यद्धर्मज्ञो भवेद्राजा | २७२ | युद्धक्रियां बिना सैन्यं | ४११ | रजतस्वर्णताम्रादि | ११२ |
| यन्त्रशस्त्राण्यग्नचूर्णं | २०६ | युद्धमुत्सृज्य यो याति | ३७४ | रम्यते सत्फले स्वान्तं | १५ |
| यन्त्राद्याताग्निकुशलाव | ३५७ | युद्धमेते बुधावाश्च | १८८ | रत्नभूतं तु तत्तत्स्याद् | २१७ |
| यन्त्राणि धातुकाराणां | २४३ | युद्धशस्त्रास्त्रकुशलो | २२७ | रत्नश्रेष्ठतरं वज्रं | २०८ |
| यन्त्राणि सेतुबन्धश्च | ८० | युद्धसम्भारपुष्टानि | १२५ | रत्नार्थं चैव क्षारार्थं | २१९ |
| यन्नामगोत्रे वंशंश्च | ११० | युद्धसम्भारसम्पन्नं | ३६३ | रत्ने स्वाभाविका दोषाः | २१४ |
| यन्मन्त्रतोऽरिनिग्रास्ते | ६९ | युद्धसम्भारसम्पन्नो | ३६२ | रथगत्या स रथपो | ७६ |
| ययातेश्च यथा पुत्रा | ३३ | युद्धानुकूलव्यापारः | ४७ | रथवाम्यस्त्रशस्त्रार्थं | १४ |
| यवाश्च चणकाः श्रेष्ठा | ३४८ | युद्धाभिमुखनिहतैः | ३७६ | रथस्य सारं गमनं | ७६ |
| यशोवृद्धिकरौ प्रोक्तौ | ३४० | युध्यमानाः परं शक्त्या | ३७५ | रङ्गप्रचारकुशला | १८ |
| यस्मिन्निन्द्रियनिरोधेन | १८४ | युवराजादिभिर्लेख्यं | ११३ | रहसि च नृपः प्राज्ञः | २६९ |
| यस्माद्देवैः प्रयुक्तानि | १०६ | युवराजो मन्त्रिगणान् | १८७ | रागलोभ भयद्वेषा | २७० |
| यस्मिन्स्मृतर्भवेत्प्रीतिः | ६३ | युवराजोऽमात्यगणो | ५८ | रागाल्लोभाद्भयाद्द्रोहात् | ५२ |
| यस्मिन्स इतिहासः स्यात् | २२९ | ये च कण्टकिनो वृक्षाः | २४५ | राजकार्योपयोग्यान् हि | ८१ |
| यस्य वाऽभ्यधिका पीडा | २१४ | ये चान्ये गुणिनः श्रेष्ठा | ७४ | राजकीयं स्मृतं लेख्यं | २१७ |
| यस्य सुद्रवते चित्तं | १८१ | येन येन प्रकारेण | २०१ | राजकुले तु बहवः | ४९ |
| यस्याधीनं भवेद्यावत् | २२१ | ये प्रियाणि प्रभाषंते | २६ | राजकृत्यं सेनपैश्च | ५१ |
| यस्याभियोगं कुरुते | २८४ | ये व्यूहरचका यान | ८६ | राजकृत्यमुभौ चौरौ | १०१ |
| यस्यावतो वक्त्रगतौ | ३४३ | योगमुद्रान्विता स्वस्था | २४९ | राजगृहं सभामध्ये | ३३ |
| यस्याश्रितो भवेल्लोक | २२१ | योग्या कान्तं च कुलटा | १७० | राजदंडभयाल्लोकः | ४ |
| याः सर्वाः पितुपत्न्यः स्युः | ३१५ | योजनानां शतं गन्ता | २१६ | राजदेशकुलज्ञाति | १३१ |
| याचकं विमुखं नैव | ८२ | योजना स्वार्थसंऋद्धयै | ३०५ | राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः | ६० |
| याचकार्थैः प्रार्थितः सन् | १४३ | यो जानात्यार्जितुं सम्यग् | २०७ | राजभागस्तु रजत | २१९ |
| याचकेभ्यो ददात्यर्थं | ८३ | योऽधीतविद्यः सकलः | २२४ | राजमार्गादिभ्ययतो | ३१८ |
| याने सपादभृत्या तु | १८२ | यो न संयोजयेदिष्ट | १८४ | राजमार्गे मुखानि स्यु | ३९ |
| यामिकार्णमहोरात्रं | ३९१ | यो वै सुपुष्टसम्भार | ३६० | राजमार्गांस्तु कर्तव्या | ३८ |
| यामिके रक्षिते नित्यं | ३६ | योषितो नित्यकर्मोक्तं | २४० | राजसेवाप्रतिग्रहेना | १७२ |
| यायाद् व्यूहेन महता | ३३८ | यो हि धर्मपरो राजा | ११ | राजसो दांभिको लोभी | ६ |
| यावज्जीवं तु तत्पुत्रे | १३० | यो हि स्वधर्मनिरतः | ५ | राजाज्ञया बिना नैव | ४४ |
| यावज्जीवं तु वा कश्चित् | १९६ | यौवनं जीवितं वित्तं | २२ | राजाज्ञानाऽपुन्नाग | २४४ |
| यावत्तुधर्मशीलः स्यात् | २०० | राजा दृष्टमिति लिखेद् | ११३ | ||
| यावन्नियमितः काकुत् | ३०७ | र | राजानं स्वकृतं यश्च | ६३ | |
| युक्तिं प्रत्यक्षमन्मानो | ७१ | रक्तं पीतं वर्तुलं चेन् | २१४ | राजा न शृणुयादन्य | ९५ |
| युक्तिश्छलात्मिका प्रायः | ४०६ | रक्तपीतसितश्याम | २०८ | राजानु युवराजस्तु | ९७ |
| युक्त्याऽनुमानतो नित्यं | २९५ | रक्तिकायाश्च द्वे वज्रे | २१२ | राजा परममित्रोऽस्ति | ९२ |
| युगपद्योजयेद् द्वन्द्व्वा | ३९२ | रक्तिद्वयं तु मुक्ताया | २११ | राजा पुरोहितादीनां | ९९ |
| युगानां न प्रजानां न.. | १९० | रक्तिमात्रः पुष्परागो | २१३ |
श्लोकानुक्रमणिका
४२६
| राज्ञामात्यप्रलोभेन | ३१२ | लोकतः शास्त्रतो ज्ञात्वा | ३२१ | वस्त्रादिमार्जनार्थं च | ३३ |
| राज्ञा मित्रमिति ज्ञात्वा | १४९ | लोकप्रचारैरुत्पन्नो | १२३ | वस्त्राद्यलङ्काररत्नानि | २३९ |
| राज्ञा विरोधिशमार्थं | १०४ | लोकप्रत्ययतः प्रोक्तं | ३०७ | वस्त्राद्यलङ्कारसंधानं | २४२ |
| राज्ञा समुद्धरेद्राष्ट्रं | ४११ | लोकप्रसिद्धमेवैतद् | १७३ | वक्त्रौपादादगूढां च | २५९ |
| राज्ञाऽस्य जगतो हेतु | १० | लोकसंकेततोऽर्थानां | २३१ | वहेदमित्रं स्कन्धेन | १६४ |
| राज्ञः समीपप्राप्तानां | ८५ | लोकसंरक्षणे दक्षः | ७ | वह्वर्न्व्ययतो भीमा | १६३ |
| राज्ञां च क्रमशॊ नाम | २९७ | लोकशासनयन्त्रस्तु | ६९ | वाक्पारुष्यमवाच्यार्थं | २८२ |
| राज्ञां सदण्डनीत्या हि | १८९ | लोकांश्चानन्दतापयति | १९१ | वाक्यपारुष्याम्यूनभूत्वा | १२१ |
| राज्ञा चाधिकृताः सन्तः | ९५ | लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं | ४०७ | वाजिगतिविदः प्राज्ञाः | ७६ |
| राज्ञादिहन्तु यस्थानं | ९० | लोको विम्रियते धर्मो | ३०३ | वाजिनामल्पयत्नेनाव | ३४५ |
| राज्ञा ये विदिताः सम्यक् | २७३ | लोभाद् भयाच्च किं तेन | १९० | वातप्रेरणयन्त्रैश्च | ३७ |
| राज्ञे षष्ठांशमुद्धृत्य | ३१९ | लोमान्न कर्षयेद्राजा | १९३ | बाध्यमाणास्तु संकेत | ७० |
| राज्ञोपि दुर्गुणान्वक्ति | ४७ | लोभेन स्वन्यथा कुर्वन् | २८७ | वायसक्षारवृक्षाणां | ११० |
| राज्ञो यदि न पापं स्यात् | ४०१ | लोभेनासेवनाद्भित्वा | ३९० | वानप्रस्थः सन्दमने | २३७ |
| राज्ञो विदितसेवी वा | २८० | लोलुप्यमानास्तेऽर्थेषु | ५९ | वामदक्षिणसंस्थो वा | १६९ |
| राज्ञो राष्ट्रस्य विकृति | २९१ | लोहजैस्ताम्रजै रीति | १२२ | वामनी सप्तताला स्या | २५० |
| रावणस्य च भीष्मादे | ९ | लोहसारमयं वापि | १५८ | वामे चार्य व्ययं दक्ष्ये | ११४ |
| राष्ट्रप्रत्यविशङ्की स्याद् | ३९६ | लोहाभिसारशस्त्रास्त्र | २६६ | वायुर्गन्धस्य सदसद | १२ |
| राष्ट्रे नित्यं प्रकुर्वीत | ४१० | लोहेऽर्था वा समा वापि | ३२३ | वारकाश्चार्धखण्डाम्यां | ३५६ |
| रिपुप्रतीक्षितानां च | १८७ | लौहो सीसमयी वापि | २६१ | वाश्याँ पाषाणपात्या | २४८ |
| रिपुर्मित्राः सेवकाश्च | ६६ | वार्ताहराः सौविकाश्च | ८१ | ||
| रूप्यं हेम च कुप्यं च | ३८६ | व | वार्धुषिकाश्च कौसीदाद् | २२० | |
| रोगः शत्रुर्नविमान्यो | १४३ | वंशानुचरितं यस्मिन् | २२७ | वाहनं मूर्तिस्पृशं | २५८ |
| रोधनं न भवेत्तस्मा | ६८ | वक्तव्यं न तथा किञ्चिद् | १६३ | वाहनत्वं गता य वै | २४२ |
| वक्ताऽध्यक्षो नृपः शास्ता | २७५ | विंशांशं वा षोडशांशं | २१७ | ||
| ल | वज्रं च जसद्ं सीसं | ३२२ | विकलाङ्गानू प्रब्रजितान् | १४६ | |
| लक्षकर्षमितो भागो | २८ | वज्रं मुक्ता प्रवालं च | २०८ | विकल्पन्तेऽवमन्यन्ते | १०० |
| लक्ष्यते विमुखश्चैव | ९२ | वदन्तीहैव क्रियया | ९ | विक्रयादानसम्बन्धे | ३११ |
| लघुयन्त्राग्नेयचूर्णं | ८६ | वर्णमाक्रामते छाया | २०९ | विक्रीणन्ति महार्धे तु | २०५ |
| लभ्यं कलासु संयोज्य | २१४ | वर्तते यस्य यद्धस्ते | ३१६ | विगृह्य चारिभिर्गन्तुं | ३६७ |
| लाभं दृष्ट्वा हरेच्छुल्कं | २१७ | वस्तुलांश्चतुरस्रान् वा | २४७ | विगृह्यमाणप्रकृति | ३७२ |
| लाभाधिक्यं यदाल्पत्वे | १७० | वर्धयञ्जिह्व वर्माथौ | २१ | विगृह्य यानं यानज्ञैः | ३६७ |
| लिखितं तु यदा यस्य | ३२१ | वर्धयेच्छास्त्रसंचतुर | ३३० | विगृह्य साधनं सम्यक् | २९५ |
| लिखिते शोधिते सम्यक् | २९३ | वर्धयेडाड्युद्धार्थं | ३२९ | विग्रहः स च विज्ञेयो | ३६६ |
| लिखित्वा शासनं राज्ञा | ४५ | वर्षाणि विंशतिर्यस्य | ३०४ | विचार्य मेधिसिः कार्यं | २७६ |
| लेखानुपूर्व्यं कुर्याद्धि | ३१२ | वसन्तो मध्यमो ज्ञेयो | १७२ | विचिन्त्य कुरुते ज्ञानी | १६९ |
| लेख्यं यत्र न विद्येत | ३१३ | वसिष्ठाद्याश्रितं नित्यं | ३०६ | विजयाख्यध्वजो तो तु | ३४० |
| लेख्यं स्वाभिमतं चैतत् | ३१३ | वसुप्रणमुनिसंख्याकै | १० | विशिष्य च नृपेनैवं | १८६ |
| लेप्या लेप्या सेकती च | २६० | वस्तुयाथात्म्यविज्ञाने | २०७ | विहङ्गलवदुत्पेताः | २७७ |
२८ शु०
| ४३० | शुक्रनीतिः |
|---|
| प्रतीक / चरण | पृष्ठ | प्रतीक / चरण | पृष्ठ | प्रतीक / चरण | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| विण्मूत्रश्लेष्मवातानां | २८० | विविधासनमुद्राभिः | २५४ | व्ययो यन्निध्युपनिधी | २०८ |
| विज्ञानामधिपं धान्वा | ७४ | विविधोपास्यमन्त्राणां | २२७ | व्यवहारक्रियाभेदा | १०२ |
| विदिताष्टांगमः शास्त्रे | ३१७ | विशिष्टचिह्नितो मीतो | ३१८ | व्यवहारधुरं वोढुं | २७२ |
| विद्यया कर्मणा शीलैः | ६४ | विशिष्टसंज्ञका ये च | ११५ | व्यवहारविदः प्राज्ञा | ८१ |
| विद्याबलोन्मदान्दृप्ता | ५३ | विशिष्टसंज्ञकैरैषां | ११५ | व्यवहारविदः प्राज्ञा | २७३ |
| विद्याभ्यासे गृहकृत्ये | १४२ | विशिष्टसंज्ञितं तत्र | ११५ | व्यवहारान् दिदृक्षुस्तु | २७६ |
| विद्याराज्यार्जनार्थं | १०९ | विशिष्टसंज्ञितैस्तद्वि | १०५ | व्यवहाराय या नीति | २४३ |
| विद्यावस्तु शरच्चन्द्रो | ९९ | विशुद्धो लभते कीर्ति | १०६ | व्यवहारे नरो याति | २९८ |
| विद्या शौर्यं च दाक्ष्यं च | १८३ | विश्वस्ताननृपस्यापि | १९८ | व्यसने सज्जमानं तं | ६० |
| विद्या ह्यनन्ताश्च कलाः | २२५ | विषमस्थाश्च नासेव्या | २८५ | व्याधिदुर्भिक्षकरकैः | ३८१ |
| विद्युतं न तु हीनं स्यात् | ३२२ | विषयामिषलोभेन | १६ | व्याधो मृगवधं कर्तुं | ४०३ |
| विद्वत्स्वपि च दारिद्र्यं | १६९ | विष्ण्वाद्यैरपि नो दत्ता | ३९९ | व्याप्नोत्यतस्तु तन्मूलं | ११६ |
| विश्वास्यन्ति च मित्राणि | १३८ | विसृजञ्छ्लेष्मपित्तानि | ३७५ | व्याप्यमायव्ययं तत्र | १२४ |
| विनिशिष्यामि दण्डेन | ४५ | विसृज्य धनमर्वस्वं | २४२ | व्याप्यानां मूल्यमानादि | ” |
| विनष्टे लिखिते राज्ञा | ३०२ | विस्तारार्धांशमध्योच्या | ३५ | व्याप्याक्षावयवाः प्रोक्ता | ” |
| विना कुङ्कुमभरणात् | १९७ | विस्रं मदित्वा चात्यर्थ | ४०३ | व्याप्यास्तिथ्यादयश्चापि | १२५ |
| विना परस्वीकरणा | ४०३ | विस्रंभाञ्चिहितं सद्धि | १०६ | व्यायच्छन्तश्च बहवः | १८ |
| विनाशनीयास्ते सर्वे | १८४ | विसंसयन्ति तन्मन्त्रं | १०० | व्याळग्राही यथा व्यालं | १७२ |
| विना स्वधर्मात् सुखं | ४ | विहरेत्सावधानस्तु | ४८ | व्यूहाभ्यासे नियुक्ता ये | १८९ |
| विनियच्छति चारमान | १९२ | विहारं वैव स्वस्त्रीभि | १४४ | व्यूहाभ्यासं सैनिकानां | ४८ |
| निश्चित पूर्वपक्षे | २९१ | वृक्षान् संपूज्य यत्नेन | ८२ | व्यूहैर्व्यूहेन व्यूहाभ्यां | ३७१ |
| विन्दत्यायुर्बलं सम्य | २२७ | वृद्धाः सुशीला विश्वस्ताः | १७५ | व्रीहिमिंग्र्दितं नेयाद् | २१३ |
| विपरीतगुणैरेभिः | १२ | वृद्धत्वाद्बुद्ध्वा च यो दत्तः | १०८ | ||
| विपरीतगुणैरेभि | ६५ | वृष्टिशीतोष्णनक्षत्र- | ४ | श | |
| विपरीतस्तामसः स्याद्- | ६ | वेदभिन्नप्रमानास्ते | २४२ | शकटः शकटाकारो | ३७३ |
| विपरीतस्तु रक्षोंऽशः | १४ | वेदमन्त्रस्वधास्वाहा | ” | शकटात्पञ्चहस्तं तु | १४८ |
| विप्रवद्विप्रकिन्नास्तु | २४२ | वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा | २६६ | शक्ता भवेन्न किं शत्रु | ४०५ |
| विभागपत्रं कुर्व्वन्ति | १०३ | वेनो नष्टस्स्वधर्मेन- | १३ | शक्तिशौर्ययुतैर्यानं | ३६७ |
| विभावयेत् प्रतिज्ञातं | २९४ | वेक्तुं प्रदेशं विषयं | २९७ | शकेनापि हि न धृतो | २१ |
| विरलः कारयेद्वाशं | ९२ | वेश्या तथाविधा वापि | १४८ | शङ्काऽसतां तु संसर्गा | २८५ |
| विरक्तलक्षणं ह्येतद् | ” | वेश्यादिदर्शनं विद्वान् | १४७ | शङ्ख-चक्र गदा-पद्म | ३३८ |
| विरुद्धो यत्र नृपति | १३२ | वेश्यामिष नटैर्मद्यैः | ३१८ | शङ्खचक्रगदापद्मे | २६० |
| विरुद्धयन्ति च तैः साकं | ९५ | वैश्यास्तु क्षत्रविप्राम्यां | २४२ | शठाश्च कातरा लुब्धाः | ६६ |
| विरोधेन बान्धव | १५० | वैदूर्यसन्निभे नेत्रे- | ३४४ | शतं दशसहस्राणि | ३२५ |
| विलोक्य भर्तुर्वदनं | २४३ | वैरीभूतोऽपि पश्चात् प्राफ् | १७८ | शतं शतं योजनान्ते | ३५४ |
| विवाहदानयज्ञार्थं | ५५ | व्यक्तं स नरके घोरे | २७० | शतप्रमामाधिपो यस्तु | २९ |
| विवाहादिषु चाचार | १९० | व्यये दद्यात् कर्म कुर्यात् | ३१९ | शतसंवत्सरान्तेऽपि | ३९६ |
| विवाहे भोजने नित्यं | १५ | व्ययश्चैव समृद्धिदौ | १०८ | शतानां तु शतानीक | ७७ |
| विवाहोत्सवयज्ञेषु | ३२३ | व्ययोभूतमिषञ्चैव | ७१ | शत्रवो नीतिहीनानां | ३ |
श्लोकानुक्रमणिका
| ४३१ | ||
|---|---|---|
| शत्रुप्रजाभृत्यभृतं - ८५ | शास्त्रेषु के समुद्दिष्टा - ७१ | श्रीमत्तामनपत्यत्व - १६३ |
| शत्रुबाहुसमुत्थं तु - १६३ | शास्त्रोक्तं मुनिबरैः - १८४ | श्रीमतः पुरुषो वेत्ति - १४० |
| शत्रुषड्वर्गमुत्सृज्य - २६ | शिंशपाशिमुबदरं - २४४ | श्रुताथैस्योत्तरं केश्यं - २१३ |
| शत्रुष्वेतानि युञ्जीत - १८२ | शिक्षां ग्यार्थि पोषणं च - ७५ | श्रुतिस्मृतिपुराणाना - १४८ |
| शत्रुसंसाधनोपायो - ३५६ | शिक्षा व्याकरणं कल्पो - २२५ | श्रुतिस्मृत्योदिता मन्त्रा - ८४ |
| शत्रुसाधकहीनस्त्व - १८६ | शिखावधि तु केशान्तं - २५ | श्रुतिस्मृती विना धर्मो - २४३ |
| शत्रूदासीनमित्राणि - १८४ | शिरःप्रच्छादकञ्चैब - २८१ | श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा - २७ |
| शत्रोः स्वस्यापि सेनाया - ३५५ | शिरोक्षितो पाणिपादौ - २५२ | श्रुत्वा मांसार्थमन्यस्तु - २१२ |
| शत्रोरनिष्टकरणा - २६९ | शिरोवर्ती यदा न स्याद् - ३०९ | श्रेष्ठं तु सर्वदुर्गेभ्यः - ३२५ |
| शत्रोरपि गुणा ग्राह्या - १३६ | शिल्पशास्य फलाबन्तो - ८६ | श्रेष्ठा गतिस्तु सा ज्ञेया - ३४४ |
| शनैः शनैः प्रवर्तत - ६४ | शिल्पिनश्चापि तत्काल - २८५ | श्रौतकल्पः स विज्ञेयः - २२७ |
| शपायै हिरण्याग्नी - २७५ | शिल्प्यग्रे वाशिनं ध्यात्वा - ३३७ | श्मश्रुहीनमुखः कान्तः - ३३८ |
| शपथामेव निर्दिष्टा - ३०७ | शिशोः संरक्षणे ज्ञानं - २३६ | श्वशुराश्चैव श्यालाश्च - ५१ |
| शफोर्ध्वं व्यङ्गुलं ज्ञेयं - ३३४ | शिशोस्तु कम्बरा ह्रस्वा - २६५ | ष |
| शब्दः स्पर्शश्च रूपं च - १६ | शीलं धनं ततो रूपं - १५४ | षट्कर्मेवद्वियोक्तव्यं - ७४ |
| शब्दाभिधानतस्वज्ञो - २७५ | शुकनासाकृतिर्नासा - २५४ | षट्त्रिंशदङ्गलमुखो - ३३३ |
| शमो दमश्चार्जवं वा - १४३ | शुकादेः पाठकाः सम्यक् - ७१ | पडेतानि सुखायालं - १७५ |
| शय्यावितानास्तरण - ८६ | शुक्रोक्तनीतिसारं यं - ३९५ | सप्तानेनापि गच्छेन्न - १७५ |
| शय्यासने पादुके च - २८० | शुचिदंशांकुराहारो - १६ | षड्दोषाः पुरुषेणेह - १३४ |
| शय्यास्तरणसंयोग - २३२ | शुना समो न किं राजा - ५३ | षड्विंशत्यङ्गुलं सक्थि - २६७ |
| शर्करां दद्याभं च - २०९ | शुष्कदेशा दृढमार्गाः - २१७ | षष्ठं दुर्गप्रकरणं - ३२४ |
| शर्करां हीनमौख्यं - २१० | शुष्कानाद्रांश्च मांसानि - ३४७ | षष्ठांशं वा चतुर्थांशं - १२१ |
| शर्करामस्य पञ्चाशत - २१२ | शूद्राय दत्तमपि यत् - १११ | षष्ठांकेनाधिका ग्रीवा - ३३५ |
| शशकी काश्मरी पाठा - २४६ | शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या - ७७ | षाड्गुण्यमन्त्रविद्याग्मी - ६९ |
| शस्त्रयुद्धं तु तन्ध्येयं - ३८० | शृङ्गस्योत्थानशीलस्य - १८२ | षोडशद्वादशदशा - २२७ |
| शस्त्रसंमार्जनकरा - ८६ | शूरः सर्वं पालयति - ३७६ | षोडशांशं स्वन्मया हि - ३२२ |
| शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु - ८२ | शूरश्च व्यूहवित्प्राज्ञः - ७६ | षोडशाब्दं मनो यः स्यात् - ४०४ |
| शस्त्रास्त्रयोर्धारणं च - १६९ | शृङ्गिणां नखिनां चैव - १४९ | स |
| शस्त्रास्त्रैः सुविनिर्मिन्नः - ३७५ | शृणुयान्मौनमाश्रित्य - ९३ | संक्रान्तो प्रतिदन्धी तद् - १७९ |
| शस्त्रास्त्रैर्दैत्यहन्त्री या - २४९ | शोधयित्वा तु पात्राणि - २३८ | संक्षेपतस्तु कथितं - ६६ |
| शस्त्रैः कनिष्ठं युद्धन्तु - १७९ | शोषयेच्चक्षपात्राणि - २३८ | संक्षेपतस्तु ध्यानादिः - २४९ |
| शांकरी श्वेतवर्णा वा - २६१ | शौण्डीराणामशौण्डीर - ३७५ | संख्यातः स्वस्परत्नानां - २१३ |
| शाखाः सेनाधिपाः सेना - ३९८ | शौर्यं पाण्डित्यवक्तृत्वं - ४६ | संग्रहस्तस्य तस्यापि - २०६ |
| शाळा भोग्ये निविष्टास्तु - १३० | शौर्यमत्तस्तु सदृशः - १४० | संपद्विपत्त्वेकरमना - १२६ |
| शासनादन्यथाचारान् - ३८८ | शौर्ययुक्तंरतान् सर्व - ६० | संयोगापूर्वविधानं - २३३ |
| शासनाथं ज्ञापनार्थं - २१६ | श्रावयित्वा तु यत्कार्य - २९० | संयोज्या तु प्रयत्नेन - ११८ |
| शास्त्रमानविहीनं यद् - २५६ | श्रावयेत् सैनिकांस्त्वित्यं - ४११ | संरक्षयेत् कृपणवत् - २०७ |
| शास्त्राय गुरुसंयोगः - २३ | श्रीमंगलपदाद्यन्तं वा - १०५ | संरक्षयेत्प्रयत्नेन - ५३ |
४३२ | शुक्रनीतिः
| श्लोकांश | पृष्ठम् | श्लोकांश | पृष्ठम् | श्लोकांश | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|---|---|
| संश्रयेद् गिरिदूर्गाणि | ५५ | सधनभेदनास्त्यान् | ३७ | समर्थः सन् ददाति | १२१ |
| संख्येयेष्वभियहेश्च | ४० | स नृपो म्लेच्छ इत्युक्तः | ४९ | समर्थैश्च तत्पक्षं | ८९ |
| संस्कर्ता तस्करादिभ्यः | २१८ | सन्दिग्धनावं वृक्षं च | १२९ | सनाप्नोषि च तत्पापं | १०२ |
| संहरन्ति च धर्मार्थं | १०६ | सन्ध्याय गमनं प्रोक्तं | १६७ | समा मध्या च श्रेष्ठा च | ११९ |
| संहरेन्निकायं सर्वं | ४१२ | सन्ध्याय यदवस्थानं | १७२ | समामासतदर्घांह | १०५ |
| संहितां च तथा होरां | ८४ | सन्धारणाद्दारूनाच | १६९ | समावर्ताः स वाजोशो | ३३९ |
| स उपायो नृपाधीनः | १८८ | सन्धिः कार्योंऽप्यनार्येण | १६४ | समासतो ह्येष्यमुक्तं | ११६ |
| स करोति महासौख्यं | ३४० | सन्ध्यादानात्कुहिभेदैः | २३३ | समास-व्यूहभेदादि | १३२ |
| स करोत्यवशंवालान् | ३३९ | सन्ध्यान्यम्यवहारस्त्री | १३० | समासात्कथ्यते चान्य | २०५ |
| सकृत् सुमुक्तं यस्यापि | ४०५ | सन्निपातावघातेष | २३३ | समासादुच्यते कृत्य | १४ |
| सकृदसङ्गम्यरतः | १९२ | सपशूधान्यवस्त्रादि | १३१ | समासाल्लक्षणं कृत्यं | ७१ |
| सख्ययुक्तं सुतीर्थार्थं | २१७ | सपादद्विगुणो हस्तो | २५५ | समाहितमतिः पश्येद् | २४९ |
| सङ्केतोमंबुराऽऽख्यायेः | २४१ | सपादशतहस्तेक्ष | ३१ | समितौ स्वात्मकार्ये वा | ४६ |
| सच्छिद्रमावलिंकी | १५२ | सपादषड्युतं दंडा | " | समीक्ष्य कुलधर्मांश्च | २७६ |
| सज्ञातात्पूर्वपक्षां तु | २८३ | ससतालादिमानेऽपि | २५५ | समीपसम्मार्गंमज्जा | १७६ |
| सज्ञातान्मूलमूलस्तु | ३१७ | सप्ततालाधुक्षता वा | २५० | समुद्रं खिझितं राज्ञा यत्नाद् | १०१ |
| सत्कारेण च ज्ञानेन | १२१ | सप्ततालो नृपः पूज्यो | १५० | सम्पदो न विसर्पन्ति | ३९५ |
| सत्यं मिथ्योत्तरं चैव | २१२ | सप्तपर्णः शमीतुङ्ग | २४६ | सम्पन्नोपि च मेधावी | ९२ |
| सत्यं वा यदि वाऽसत्यं | ७० | सप्तभिर्मिश्ल भिक्षार्थं | १०६ | सम्पूर्णाननदानेन | १२१ |
| सत्यं साक्ष्यं ब्रुवन् साक्षी | ३०१ | सप्तहस्तोन्नतिमंद्रे | ३३३ | सम्भारदानभोगार्थं | ३३१ |
| सत्येन पूयते साक्षी | ३०१ | सप्ताहङ्गुलं करफलं | २५२ | सम्मारपं देवतुष्टि | ७४ |
| सत्त्वस्य तमशः साम्या | ६ | सप्ताह्ननवदशभि | ११६ | सम्भूय कुर्वतां तेषां | ३१८ |
| सत्यं हितं वक्ति याति | १६८ | सबन्धं सप्रतिभुवं | १५७ | सम्मीलनं प्रसरणं | ३६९ |
| सभिकश्चतुद्वारं | ३३ | स मृते यं स धर्मः स्या | २७४ | सम्यग्विचारितमिति | ११३ |
| स दस्यु राजरूपेण | ९५ | समतुंकां च भगिनी | १४३ | सम्यङ् निरुप्य तान् | १७१ |
| सदा कुर्याच्च स्वायत्तं | ३१ | समागमनशीलस्य | १४७ | स याति नरके घोरे | ३७९ |
| सदानुरक्तवेषः स्यान् | ८९ | सभा वा न प्रवेष्टव्या | २७१ | सरसालङ्कृतादुष्ट | २३० |
| सदानुरक्तप्रकृतिः | १६ | समाभ्यां कूपवापी | ३२ | स राज्ञाऽर्हो भवेन्नैव | ४९ |
| सदारप्रौढपुत्रान् द्राक् | १५८ | सभायां विद्यया मान | १७४ | सर्वं यत्त्कार्यजातं | ८४ |
| सदाऽल्पमप्युपकृतं | १७७ | सभ्यादिभिर्विनिर्णिक्त | ३१४ | सर्वतः फलमृगू भूत्वा | २२१ |
| सदा सुख्डवचनेः | ९६ | सभ्यादीन् दण्डयित्वा तु | २८३ | सर्वतः स्वात्सममुखं | ३३ |
| स देशः प्रवरोयत्र | १७१ | सभ्यानां बान्धवानां च | ४८ | सर्वमीक्षेत नादित्यं | १३० |
| सदैकेनार्थकं राज्यं | ४९ | सभ्याधिकारिप्रकृति | ५७ | सर्वदर्शी प्रधानस्तु | ६९ |
| सदैव कुटिलाः सख्युः | १९३ | सभ्येष्पक्षपातस्तु | १६५ | सर्वदा भेदनं शत्रो | १८७ |
| सदैव व्यूहसङ्केतः | १८५ | समः सुहृच्च सम्बन्धी | ९९ | सर्वदोषहरोऽश्वानां | ३४८ |
| सङ्ग्रामेन हरेन्मित्रं | २७ | समक्षं वक्ति न मषा | २१ | सर्वपमवांबनाक्षीच | ३९४ |
| सङ्गोगामावतः साक्षि | ३०२ | समन्यूनाधिकत्वेन | २३० | सर्वनामा स विख्यातः | ३४० |
| सद्यः केचिच्च कालेन | ३१७ | समन्यूनाधिकेरंदंडे | ३१९ | सर्वभूतात्मतुल्यो यो | ८१ |
| सद्रक्षणे दुष्टनाशः | २२४ | समन्यूनाधिकैरंरेशे | ३५१ |
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोक/वाक्य | पृष्ठ | श्लोक/वाक्य | पृष्ठ | श्लोक/वाक्य | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| सर्वयत्नेन माध्यस्थ्यं | १६४ | साधन्करश्चैव प्राचीन | १०६ | सुकृतं यत्त्वया किञ्चित् | १०२ |
| सर्वलोकव्यवहार | २ | साधारणमिदं मान | ३३४ | सुखं च न बिना धर्मात् | १२५ |
| सर्ववर्णोत्तमां कन्यां | २८५ | साधुभ्योऽतिस्वमृदुत्वं | ५४ | सुखप्रबन्धगोष्ठीपु | ८९ |
| सर्वविद्याकलाम्यासे | ५३ | साध्वी भार्या पितृपत्नी | १४६ | सुखाय कल्पते नित्यं | २७३ |
| सर्वविद्यासु कुशलो | ५७ | सामंतः स नृपः प्रोक्तो | २८ | सुखासक्तोऽस्यजेद् भृत्यान् | १८९ |
| सर्वस्मादधिको दाता | ५२ | साम दानञ्च भेदञ्च | ७० | सुगतिदुर्गतिर्नित्यं | ३४५ |
| सर्वांशैः सर्वरम्यो हि | २५३ | सामन्तादिपदभ्रष्टा | २९ | सुगत्याऽग्निर्निरुं दाढ्यं | ३४७ |
| सर्वामोह करं नीति | १ | सामन्तादिषु धर्मोऽयं | ४६ | सुजनैः संगमं कुर्या | २५ |
| सर्वेभ्यः श्फटाः श्रेष्ठा | ३५४ | सामन्तादिसमा ये तु | २९ | सुतसङ्कोइपत्रं वा | ३०७ |
| सर्वोपजीवकं लोक | १ | सा माता प्रीतिदा नित्यं | १६८ | सुतस्य सुतदाराणां | ३१६ |
| सर्वोपायैस्तथा कुर्यान् | १८६ | सामात्ययुवराजादियं | २०१ | सुतास्तनैर्विनेया हि | ३५३ |
| सवनाद्यैश्च सा शिक्षा | २२७ | सामान्यं याचितं न्यास | ३१९ | सुदरिद्रं रोगिणं च | १२९ |
| सव्यःसारवेधोथ | ३३१ | सामान्यान् दशहस्तैश्च | २४४ | सुदासदास्यौ सदूदेहुः | १७४ |
| स बाणो दलभङ्गी तु | ३४४ | साम्मुख्येन प्रयातेन | ३८१ | सुदीर्घेणापि कालेन | २१८ |
| सशूलिकं गृहीतं यद् | १०६ | सायं ग्रीष्मे तु शरदि | ३४७ | सुदृष्टंन्नास्तु दायादा | ६१ |
| सवेरलक्षिता शीघ्रं | २४० | सायं प्रातः सैनिकानां | १८९ | सुनीतिकुशला नित्यं | २ |
| सशस्त्रो दशहस्तं तु | ९८ | सायं प्रातस्तु घर्मान्ते | २४५ | सुनीतिशास्त्र कुशलान् | ९० |
| स हृदावन्न सङ्कुर्या | २४२ | सायंव्ययैर्मुहूर्तानां | ४१ | सुपुष्टं कान्तिमद्भाति | २०५ |
| ससङ्करचतुर्वर्ण | १२३ | साद्र्धव्याघ्रक्रोडशूष्ठ | २५२ | सुपुष्पाश्चैव ये वृक्षा | २४४ |
| ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु | ७२ | सार्धं द्विकोटिहस्तेश्च | ३० | सुप्ते पत्न्यौ तदभ्यास्य | २३९ |
| ससाक्षिमच्च तन्प्रोक्तं | १०४ | सार्धंचतुस्तालमितः | २६३ | सुफलं तु भवेत्कर्म | १३८ |
| सह सुखेन नृपतिः | ३५७ | सार्धाङ्गुलं स्तटास्थानं | ११५ | सुभूषणः सुवसनः | ५२ |
| सहस्रचापप्रमितं | ३४६ | सावधानमना नित्यं | १३४ | सुभूषणां सुसंशुद्धां | ५५ |
| सहस्रहस्तविस्तारो | २४७ | सावधानमना भूत्वा | ४० | सुभूपता तु यन्नीत्या | ४०६ |
| सहस्रेऽपद्धते चाम्निः | १०८ | सावधानमनाः सिद्ध | ४८ | सुभृत्यास्तैपि सन्त्यार्या | ८६ |
| सहायगौरवाद् विद्या | १९५ | सावधारणकं चैव | १०२ | सुमदद्गुणिर्न स्वातै | १२७ |
| सहायपूर्ण यद् दुर्गं | ३२५ | साश्वश्च सगजश्चापि | १८ | समुखाडजयवनेऽडो | ३३२ |
| सहायवान्सहामात्य | ३४ | साहसिकं चाधिकं च | १०७ | सुयुक्त्याऽण्वार्जनं यत्र | २३० |
| सहायसैन्यदुर्गे तु | ३२५ | साहसिकस्तु संयोज्य | ७७ | संयुक्तकार्मुकं सारम् | ३२८ |
| सहासनश्चातिमानी | २८२ | साहसेषु च सर्वेषु | २९९ | सुक्ष्मामुक्ष्भरणाद्या | २२१ |
| सांग्रामिकश्च कल्पस्ति | ७० | साहित्यशास्त्रनिपुणः | ८३ | सुवर्चिलवणाङ्गाङ्गाः | १५८ |
| सा किं महाधनायैव | १७२ | सिंहशावा इव घ्नन्ति | ५९ | सुवर्णं द्विशतांशं तु | ३२२ |
| सा क्रिया सन्धिरित्युक्ता | ३६३ | सिद्धिक्यान्यथा पित्रा | २१७ | सुवर्णं रजतं ताम्रं | २१४ |
| साक्षिसम्भावसञ्ज्ञानां | ११४ | सीरभेदैः कृषिः प्रोक्ता | २२४ | सुवर्णरत्नरजत | १३० |
| साङ्गानां सोपवेदानां | १५० | सीवने कञ्चुकादीनां | २३५ | सुवसाचैर्भूर्षवित्ला | ३० |
| सातपत्र-पदत्राणो | १२५ | सुक्रान्तिगन्धवर्णैश्च | १३८ | सुविधमाह्मणगुरोः | ३७७ |
| सात्त्विकं राजसं चैव | ५ | सुकृत्यै संत्यजेन्नित्यं | २१ | सुविधा मन्त्रमौषध्य | ३४१ |
| सात्त्विकी राजसी देव | २४९ | सुकुलश्च सुशीळश्च | ३५ | सुविस्तृतदळस्तथैव | २११ |
| सुशिल्पशक्तः सम्यक् | ८० |
४३४ || शुक्रनीतिः
| श्लोकार्ध / पद | संख्या | श्लोकार्ध / पद | संख्या | श्लोकार्ध / पद | संख्या |
|---|---|---|---|---|---|
| सुसञ्चितं बलं धार्यं | १५७ | स्त्रीपुत्रार्थं कृतो यच्च | २०१ | स्वप्रजादण्डमेदेश्च | १८७ |
| सुसमृद्धं चिरस्थायी | २०५ | स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च | ३७४ | स्वप्रजाधर्मसंस्थानं | २६९ |
| सुसेविताः प्रकुप्यन्ति | १३३ | स्थलावयवविज्ञानं | ११५ | स्वप्रजानां न भेदेन | १८४ |
| सुहृत्संबन्धिकीपुत्र | १८५ | स्थलेभ्यस्तेषु सन्तिष्ठेत् | ३७१ | स्वभावगुप्त्या दास्यत्वे | २९ |
| सुहृदं भ्रातरं बन्धु | १४२ | स्थानात्तेभः कालकृतः | १८४ | स्वभागार्द्धहरा कन्या | ३१७ |
| सुहृद्भिरामयः स्नाने | ३६५ | स्थावरस्य ग्रामपादि | २१७ | स्वभावतो भवन्त्येते | १८३ |
| सूचहस्तोमकाम्यां वा | २८० | स्थावरेषु विवादेषु | ३१२ | स्वभावदुष्टानेतान् हि | २१७ |
| सूचीसूक्ष्ममुखो दीर्घे | ३०३ | स्थितो मृत्युमुखे चाई | १६० | स्वयं ग्राह्येण ताम्बूलं | २८० |
| सूचीतुल्यं शकटव | ३६९ | स्थूलकुक्षिः सिंहदृक् च | ३३२ | स्वयं धर्म परो भूत्वा | २२२ |
| सूक्ष्मज्ञानि च रक्षन्तु | १८८ | स्नानशीलः सुसुरभिः | १२५ | स्वयम्भूभगवाँल्लोक | १ |
| सेनपैस्तु बिना नैव | ९८ | स्निग्धदीपेन्द्रशिखालोक | १७ | स्वयं सर्वं तु विसृजे | ५१ |
| सेनादुर्गं तु यस्य स्यात् | ३२५ | स्नुह्रार्काणां रसोनस्य | ३५८ | स्वरक्षणं शत्रुनाशो | ३६१ |
| सेनाबलन्तु द्विविधं | ३२८ | स्नेहं सम्पादयेत् पश्चात् | ३४७ | स्वरैरुदात्तादिधर्मैः | २२७ |
| सेनासङ्गं सज्जं स्यात् | ३८७ | स्मृतिर्विनिर्णयं ब्रूते | २७५ | स्वस्वाणि मानवादीनां | २४८ |
| सेव्यो वा वणिग्भृत्या | ३१६ | स्वकनिष्ठां रितुभ्यं वा | ५९ | स्वर्णदण्डधरो पार्श्वे | ५३ |
| सेर्वां वाऽपिच स्वीकुर्यात् | ३६४ | स्वकार्यं साधयेत् प्राज्ञः | १८४ | स्वर्णरत्नगलङ्कार | ८६ |
| सेवाशौर्यादिभिस्तुष्टः | १०३ | स्वकार्ये शिथिलो यः स्यात् | २०७ | स्वर्णस्य तद्य पत्रमूल्यं | २१२ |
| सेवितस्त्वथु राज्ञो नै | १२९ | स्वकार्यार्थ प्रकुर्व्वन्ति | १६७ | स्वर्गस्योत्तमकार्ये तु | ३२२ |
| सैनिकाः कति सन्त्येतेः | ७८ | स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः | ६१ | स्वर्णादर्थं च रजताव् | २१९ |
| सैनिकाः सैनिकैरेव | २७२ | स्वगमाऽन्यगमा चेति | ३२७ | स्वर्णादीनां तु याथात्म्य | २५५ |
| सैनिकार्थं तु पण्यानि | ३८७ | स्वगमा या स्वयं गन्त्री | ३२७ | स्वर्णाद्यलङ्कारकृतिः | " |
| सैनिकैरन्यसेवित्वं | ३८८ | स्वगुणश्रवणात्रित्यं | १७७ | स्वविशिष्टं च यच्चिह्नं | १२२ |
| सैन्याद्विना नैव राज्यं | ३२७ | स्वगोत्रे तु तथा कुर्यात् | ३३० | स्वनेपरूपसदृशान् | १९८ |
| सैन्याधीशेन प्रथमं | ३८१ | स्वजनेनै विरुद्धयेत | ३३४ | स्वशक्तितानां सामीप्यं | १४९ |
| सैवाचार्यः पुरोधा यः | ६८ | स्वतन्त्रः साधयन्नन्यान् | ३१२ | स्वशिशुं शिक्षयेदन्य | १७९ |
| सोदरेषु च सर्वेषु | ६२ | स्वतन्त्राः सर्व एवेते | ३१६ | स्वसंपत्तिमदान्नेव | ६२ |
| सोऽन्ते नरकमाप्नोति | ३७९ | स्वत्वनिवर्तको द्वेधा | १०९ | स्वः सदृशः समीपे वा | ५२ |
| सोऽप्यं साधनं यच्च | ३२० | स्वदुर्गुणं श्रवणतो | १७७ | स्वसैनिकैर्विना कोऽपि | ३६८ |
| सौजन्यात् साधकं मैत्रं | ३२८ | स्वदोषदर्शनां कार्याः | ५० | स्वस्तिकशङ्खनिस्त्रिंशैर् | ३३८ |
| सौदायिकं धनं प्राप्य | ३१७ | स्वधर्मं परमं मत्वा | ४०१ | रवस्वत्वेऽधिकसंगं त | १०७ |
| स्कन्धादि मुण्डमूलान्तं | ३३५ | स्वधर्मनिरताम्ब्रूरान् | ५९ | स्वस्वधर्मपरो लोके | २२२ |
| स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि | ३४ | स्वधर्मनिरतो नित्यं | १३५ | स्वस्वमुष्टेश्चतुर्भौऽशो | २५० |
| स्तेनकूटनिसृष्ट्यर्थं | ४०७ | स्वधर्मनीतिबलवां | १३९ | स्वहस्तकालसम्पन्नं | १०३ |
| स्त्रियोमूलमनर्थस्य | १४५ | स्वधर्माचरणे दक्षो | ८१ | स्वहस्त लिखितं वाऽन्य | २९६ |
| स्त्रीकट्यां परिधिः प्रोक्तः | २६५ | स्वनामाकृतयश्चैते | २६२ | स्वाधीनप्रतिप्राकारो | ३६ |
| स्त्रीणां नामापि संह्रादि | १८ | स्वपुष्टौ राजपुष्टौ वा | २८९ | स्वाहेतुभिर्न हन्येत | १३६ |
| स्त्रीणां नैव तु देवः स्याद् | १२९ | स्वपूर्वजपिण्डदत्वाद् | १४३ | स्वागमी सद्धमयी पात्र | २०२ |
| स्त्रीणां शीलाभिभोगेपु | ३१० | स्वपूर्वाशं द्वितीयेऽह्नि | ३९१ | स्वाग्रे दक्षिणभागे तु | ५१ |
| स्त्रीपुत्रमोहा बह्वश्वान् | १६ | स्वपेद् भूमावप्रमत्तः | २४० | स्वातन्त्र्यं न क्षणामपि | १२८ |
श्लोकानुक्रमणिका
| पाद / श्लोक | पृष्ठ | पाद / श्लोक | पृष्ठ | पाद / श्लोक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| स्वाभ्यन्तसन्निकर्षेण | ६० | स्वीया तु परकीया वा | १२८ | हीनमध्यादिसंयोग | २३४ |
| स्वाभ्यन्तसन्निकर्षेण | १२९ | स्वीया तया च सामान्या | ४०७ | हीनश्मश्रुनिमेषां च | २५९ |
| स्वाधिकारिगणस्यापि | १८८ | स्वेष्टहानिकरः शत्रुः | २६९ | हीनाङ्गी स्वामिनं हन्ति | ,, |
| स्वाधीनं सन्निरतं द्वेधा | १०७ | ह | हीनादिरससंभोगात् | २३२ | |
| स्वानुत्पादितसंत्रास | ७१ | हंसाः स्खलन्ति कूजन्ति | ४७ | हीना निम्ना छदिर्नस्याद् | ३५ |
| स्वान्तेऽभिचूर्णं संधार्य | २५७ | हयग्रीवो वराहश्च | २५९ | हीनाल्पकर्मिणश्चैते | ८६ |
| स्वान् दुर्गुणान् परित्यज्य | १४ | हरेद् पादं वनात्तस्य | १९५ | हीने तदर्धा कटके | १२३ |
| स्वान्दोलायितहृद्स्तु | ३३१ | हस्तपादाङ्गुष्ठयोश्च | २५६ | हीयते कुशहायेन | ५८ |
| स्वामिकार्ये विनष्टोय | १२० | हस्त्यश्वरथचर्मांसु | ३७७ | हीयते नान्यथा राजा | ७५ |
| स्वामित्वं चैव दातृत्वं | १९ | हावभावादिसंयुक्तं | २३२ | हृतराज्यस्य पुत्रादौ | १९१ |
| स्वामिन्नेवानुरक्तो यो | ४०७ | हिङ्गुलस्य तथा कान्त | ३५९ | हृदि विद्ध इवात्यर्थं | २६ |
| स्वामी स एव विज्ञेयो | ४०५ | हितं त्वरितवच्चान्ते | ४०० | हृन्मध्य-परिविक्षेपः | २५५ |
| स्वाम्यमात्यसुहृत्कोश | १० | हितास्तेयान्यथाकाम | १२६ | हृष्टं कृत्वा स्वीयवलं | ३६७ |
| स्वाम्यसेवकसेव्यार्थं | १०५ | हितोपदेष्टा शिष्यस्य | १३ | हृष्टरोमा भवेद् वशूः | ४७ |
| स्वारम्भपूतिसदृशे | ११२ | हित्वा प्राक्पश्चिमौ यामौ | १४४ | हेतु प्रमाणसम्बन्ध | ११० |
| स्वारब्धो नीतिमान् राजा | ३ | हिमांशुमालीव तथा | २५ | हेतुल्लिङ्गोपधोभिर्यो | ८४ |
| स्वाविरुद्धं केवल्यमिदं | ११३ | हिरण्यपशुधान्यादि | १०६ | हेमकारादयो यत्र | ३१८ |
| हेमान्यम्बुस्त्वपुरुषः | २७४ |
[मुद्रा/मुहर]
वेदाङ्ग पुस्तकालय
२२४८
(इस पृष्ठ पर छपा हुआ मूल पाठ अत्यधिक धुंधला (faded) होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है।)
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८ वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली । प्रकाशानन्दकृतं अंग्रेजी अनुवाद तथा टिप्पणीसहित । सम्पादक आर्थर वेनिस २५-००
९ संगीत का विकास और विभूतियां । प्रो०-श्रीपदबन्द्योपाध्याय ६-००
१० श्रीमद्भगवद्गीता । श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य-मधुसूदनसरस्वती विरचित गूढार्थदीपिकाव्याख्यासहिता महामहोपाध्याय पण्डित श्रीहरिनामकृपालुद्विवेदीना कृततत्त्वविवेचनापरं सटिप्पण हिन्दी भाषानुवादसमलंकृता पण्डित श्रीकान्तदत्त शर्मणा संपादिता च ५०-००
११ मेघदूतम् । कालिदास कृत कात्यायनी संस्कृत व्याख्या तथा अनुवाद सहित, आलोचनात्मक विस्तृत भूमिका सहित २०-००
१२ भारतीयदर्शन । (भारतवर्ष की समस्त दार्शनिक वैदिक और तान्त्रिकविचारधाराओं का प्रामाणिक विवरण) सभी विश्वविद्यालयों में बी० ए०, एम० ए० के पाठ्यग्रन्थ, लेखक आचार्य बलदेव उपाध्याय ३५-००
प्राप्तिस्थान—चौखम्बा संस्कृत संस्थान, वाराणसी