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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 459 of 526

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Page 459

चतुर्थोऽध्याये सेनानिरूपणप्रकरणम् ३७३

शत्रुसंकट से बचने का कोई उपाय निश्चित न कर सके तब तक किसी को पता न चल सके ऐसा कौवे के आंख की पुतळी की तरह दोनों ओर का व्यवहार रक्खे। दिखावे में दूसरा कार्य और करने में दूसरा कार्य रक्खे। इसी को 'द्वैधीभाव' कहते हैं।

सदुपायैश्च सन्मन्त्रैः कार्यसिद्धिरथोद्यमैः ॥ २६२ ॥
भवेदल्पजनस्यापि किं पुनर्नृपतेर्नहि ।

उपाय करने से कार्य सिद्ध होने का निर्देश— जब कि तुच्छ व्यक्ति के भी अच्छे उपायों, अच्छी सलाह एवं उद्यमों के द्वारा कार्य सिद्ध होते हैं तब क्या राजाओं के कार्य उन सबों के करने से नहीं हो सकते हैं अपितु अवश्य हो सकते हैं।

उद्योगेनैव सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ॥ २९३ ॥
न हि सुप्तमृगेन्द्रस्य . निपतन्ति गजा मुखे ।

उद्योग की अवश्य कर्त्तव्यता का निर्देश— उद्योग करने से ही संपूर्ण कार्य सिद्ध होते हैं न कि केवल मनोरथ करने से क्योंकि देखा भी जाता है कि—सोये हुये व्याघ्र के मुख में बिना उद्यम के स्वयं हाथी नहीं गिर पड़ता है, अपितु उसके लिये प्रबल उद्योग करना पड़ता है तभी कार्यसिद्धि होती है।

अयोऽभेद्यमुपायेन द्रवतामुपनीयते ॥ २९४ ॥
लोकप्रसिद्धमेवैतद् वारि वह्नेर्नियामकम् ।
उपायोपगृहीतेन तेनैतत् परिशोष्यते ॥ २९५ ॥
उपायेन पदं मूर्ध्नि न्यस्यते मत्तहस्तिनाम् ।

अभेद्य (कठिन से कठिन) लोहा भी उपाय करने से पिघलाया जाता है। और लोक में यह प्रसिद्ध ही है कि जल अग्नि को बुझा देनेवाला होता है परन्तु यदि उपाय का अवलम्बन किया जाय तो वही अग्नि उल्टे जल को सुखा देनेवाली हो जाती है। उपाय से ही मतवाले हाथी के भी मस्तक पर पैर रक्खा जाता है।

उपायेषूत्तमो भेदः षड्गुणेषु समाश्रयः ॥ २६६ ॥
कार्यौ द्वौ सर्वदा तौ तु नृपेण विजिगीषुणा ।
ताभ्यां विना नैव कुर्याद् युद्धं राजा कदाचन ॥ २९७ ॥

भेद और समाश्रय की श्रेष्ठता का निर्देश— शत्रु को जीतने के लिये उपायों में सर्वोत्तम उपाय 'भेद' (फूट डालना) है तथा सन्धि आदि षड्गुणों में श्रेष्ठ 'समाश्रय' (बलवान का आश्रय) माना गया है। अतः विजय चाहने-वाला राजा सर्वदा इन दोनों को करे। इन दोनों का बिना सहारा लिये राजा किसी शत्रु के साथ कभी युद्ध न करे।