शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३७२ | शुक्रनीतिः
सेना को आराम देनेवाली हों, उन सबों को आसन में (घेरा डालकर) स्थित राजा यत्नपूर्वक बहुत दिनों तक चारो ओर से रोकता रहे अर्थात् उन्हें शत्रु तक न जाने देवे।
विच्छिन्नविविधासारं प्रक्षीणयवसेन्धनम् ॥ २८६ ॥
विगृह्यमाणप्रकृति कालेनैव वशं नयेत् ।
सन्ध्याय आसन के लक्षण— शत्रु की सेना में जाने-आने के मार्ग को रोक देने पर एवं घास तथा जलाने की लकड़ी समाप्त होने पर तथा मन्त्री आदि अधिकारी वर्गों में आपस में विग्रह उपस्थित करा दे। हो जाने या करा देने पर थोड़े ही समय में शत्रु को वश में किया जा सकता है।
अरेश्च विजिगीषोश्च विग्रहे हीयमानयोः ॥ २८७ ॥
सन्धाय यदवस्थानं सन्धायासनमुच्यते ।
जब विजयार्थी आक्रमणकारी एवं शत्रु (जिसके ऊपर आक्रमण किया जाय) दोनों लड़ते २ क्षीण बल हो जाते हैं तब उन दोनों के सन्धि करके अपने २ स्थान पर स्थित रहने को ‘सन्ध्याय आसन’ कहते हैं।
उच्छिद्यमानो बलिना निरुपायप्रतिक्रियः ॥ २८८ ॥
कुलोद्भवं सत्यमार्यमाश्रयेत बलोत्कटम् ।
आश्रय के लक्षण— जब किसी बलवान् शत्रु द्वारा राज्य उच्छिन्न कर दिया जाय या उसका अवसर आ जाय और उसके प्रतीकार का कोई उपाय न दिखाई पड़े तो राजा अत्यन्त बलवान्, कुलीन, सत्यप्रतिज्ञावाले एवं श्रेष्ठ आचरण से युक्त किसी दूसरे राजा का आश्रय लेकर शत्रु को परास्त करे।
विजिगीषोस्तु साह्यार्थाः सुहृत्सम्बन्धिबान्धवाः ॥ २८६ ॥
प्रदत्तभृतिका ह्यन्ये भूपा अंशप्रकल्पिताः ।
सैवाश्रयस्तु कथितो दुर्गाणि च महात्मभिः ॥ २६० ॥
विजय के लिये चढ़ाई करनेवाले राजा के सहायता के लिये उसके मित्र, सम्बन्धी, बान्धव तथा इनसे अन्य जीविकार्थ जागीर प्राप्त किये हुये लोग किंवा ऐसे राजा जिनके लिये विजित राज्य में से नियत भाग दे देने का निश्चय किया गया हो, ये सब उचित होते हैं अतः इनके आश्रय में चला जाना किंवा किसी सुदृढ़ दुर्ग का आश्रय लेना, इसी को विद्वानों ने 'आश्रय' कहा है।
अनिश्चितोपायकार्यः समयानुचरो नृपः ।
द्वैधीभावेन वर्तेत काकाक्षिवदलक्षितम् ॥ २६१ ॥
प्रदर्शयेदन्यत्कार्यमन्यमालम्बयेच्च वा ।
द्वैधीभाव के लक्षण— समय के अनुसार बर्त्ताव करनेवाला राजा जब तक