शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context३७४ | शुक्रनीतिः
परस्परं प्रातिकूल्यं रिपुसेनपमन्त्रिणाम्।
भवेद् यथा तथा कुर्यात् तत्प्रजायाश्च तत्स्त्रियाः ॥ २९८ ॥
जिस रीति से शत्रु के सेनापति और मन्त्रियों में परस्पर अनबन हो जाय एवं शत्रु की प्रजा के साथ और रानियों के साथ किंवा सेनापति और मन्त्रियों का अपनी २ सन्तान या स्त्रियों के साथ परस्पर अनबन हो जाय उस रीति का अनुसरण राजा को करना चाहिये ।
उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य शत्रोः स्वस्यापि सर्वदा।
युद्धं प्राणात्यये कुर्यात् सर्वस्वहरणे सति ॥ २९९ ॥
लाचारी होने पर युद्ध करने का निर्देश— प्रथम शत्रु के तथा अपने बीच में खूब विचार कर सामादि उपायों तथा सन्धि आदि षड्गुणों में जो उचित हो उनका प्रयोग करे किन्तु जब प्राण संकट अथवा सर्वस्व का हरण उपस्थित हो जाय तब लाचारी से युद्ध करे ।
स्त्रीविप्राभ्युपपत्तौ च गोविनाशेऽपि ब्राह्मणैः ।
प्राप्ते युद्धे क्वचिन्नैव भवेदपि पराङ्मुखः ॥ ३०० ॥
स्त्री, गौ, ब्राह्मण के रक्षार्थ युद्ध न करने से हानि— स्त्री तथा ब्राह्मण के ऊपर अनुग्रह करने के लिये किंवा गौ या ब्राह्मण का विनाश उपस्थित होने पर रक्षार्थ युद्ध करने में कभी भी नहीं मुख मोड़ना चाहिये ।
युद्धमुत्सृज्य यो याति स देवैर्हन्यते भृशम्।
यदि कोई ऐसे समय में युद्ध छोड़ कर भाग जाता है तो उसका देवगण अधिक विनाश करते हैं ।
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः ॥ ३०१ ॥
न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रधर्ममनुस्मरन्।
किसी के ललकारने पर क्षत्रिय को अवश्य युद्ध करने का निर्देश— प्रजा का पालन करता हुआ राजा अपने समान या अपने से उत्तम किंवा हीन-बलवाले किसी शत्रु के ललकारने पर क्षत्रिय-धर्म का ख्याल करता हुआ उसके साथ युद्ध करने से न हटे ।
राजानं चावियोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ३०२ ॥
भूमिरेतौ निगिलति सर्पो बिलशयानिव ।
युद्ध से पीछे हटनेवाला राजा एवं प्रवास करने से मुख मोड़नेवाला ब्राह्मण इन दोनों को पृथ्वी उस भांति निगल जाती है जिस भांति से सर्प बिल में रहनेवाले मूसे आदि को निगल जाता है ।
ब्राह्मणस्यापि चापत्तौ क्षत्त्रधर्मेण वर्ततः ॥ ३०३ ॥
प्रशस्तं जीवितं लोके क्षत्त्रं हि ब्रह्मसंभवम्।