शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| ३६८ | शुक्रनीतिः |
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मध्ये कलत्रं कोशञ्च स्वामी फल्गु च यद्धनम्।
ध्वजिनीं च सदोद्युक्तः स गोपायेद्दिवानिशम्॥ २६२॥
**रास्तों में सेना को चलाने की व्यवस्था—**राजा चाहे दुर्वृत्त (दुष्ट-चरित्र वाला) या नीच कुल का भी हो, किन्तु यदि दाता हो तो सेना उस पर अनुरक्त रहती है। अतः पारितोषिक-प्रदान द्वारा अपनी सेना को प्रसन्न करके श्रेष्ठ वीर पुरुषों से घिरा हुआ, अपनी सेना के आगे २ रहकर सेनानायक शत्रु पर चढ़ाई करे। और सेना के मध्य में स्त्री, कोश (खजाना), राजा और साधारण धन को रख कर इनकी तथा अपनी सेना की रात दिन सावधानी से सेनापति रक्षा करे।
नद्यद्रिवनदुर्गेषु यत्र यत्र भयं भवेत्।
सेनापतिस्तत्र तत्र गच्छेदू व्यूहकृतैर्बलैः॥ २६३॥
**नदी-पर्वतादि में भय की संभावना होने पर व्यूह बांध कर चलने का निर्देश—**जहाँ जहाँ पर मार्ग में नदी, पर्वत, वन तथा दुर्गम स्थान आने पर भय की संभावना हो, वहाँ वहाँ पर सेनापति सेना को व्यूहाकार में रखकर चले।
यायाद् व्यूहेन महता मकरेण पुरोभये।
श्येनेनोभयपक्षेण सूच्या वा धारवक्त्रया॥ २६४॥
**मकर, श्येन व सूचीमुख व्यूहों का नाम व योजना स्थल का निर्देश—**यदि आगे से भय की संभावना होतो बड़े मगर के आकार की व्यूह-रचना कर के चले, अथवा उभय पक्षवाले श्येन (बाज) पक्षी के आकार की किंवा तीक्ष्ण मुखवाली सूची के आकार की व्यूह-रचना कर के चले।
पश्चाद्भये तु शकटं पार्श्वयोर्वज्रसंज्ञकम्।
सर्वतः सर्वतोभद्रं चक्रं व्यालमथापि वा॥ २६५॥
**शकट, वज्र, सर्वतोभद्र, चक्रव्यूह, व्यालव्यूहों का नाम-निर्देश—**पीछे से यदि शत्रु-भय हो तो 'वज्रव्यूह', चारो तरफ से भय हो तो 'सर्वतोभद्र-व्यूह', चक्रव्यूह अथवा व्यालव्यूह की रचना करे।
यथादेशं कल्पयेद्वा शत्रुसेनाविभेदकम्।
अथवा देशानुसार शत्रु की सेना को भेदन करनेवाले व्यूह की रचना करे।
व्यूहरचनसङ्केतान् वाद्यभाषासमीरितान्॥ २६६॥
स्वसैनिकैर्विना कोऽपि न जानाति तथाविधान्।
**बाजा बजाने के ढङ्ग से संकेतों के जानने का निर्देश—**और बाजा बजाने के ढङ्ग से किये गये व्यूह की रचना के संकेत ऐसे हों जिन्हें अपनी सेना के अलावा दूसरा कोई सैनिक न जानता हो।